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संधि की परिभाषा और उदाहरण || स्वर संधि की परिभाषा || व्यंजन संधि की परिभाषा || विसर्ग संधि की परिभाषा || संधि किसे कहते हैं || संधि की परिभाषा संस्कृत मे || Sandhi kise kahate hai || Vyanjan sandhi kise kahate hain ||

संधि की परिभाषा –

संधि की परिभाषा
संधि

दो समीपवर्ती वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है उसे संधि कहते हैं। संधि में पहले शब्द के अंतिम वर्ण और दूसरे शब्द के आदि (पहले) वर्ण का मेल होता है।

संधि के उदाहरण –

देव + आलय = देवालय

दिशा + अंतर = दिशांतर

उत् + लाश = उल्लास

सदा + एव = सदैव

 संधि के भेद –

संधि के प्रथम वर्ण के आधार पर संधि के तीन भेद होते हैं।

1. स्वर संधि

2. व्यंजन संधि

3. विसर्ग संधि

स्वर संधि की परिभाषा –

स्वर के बाद स्वर अर्थात दूसरों के मेल से उत्पन्न होने वाले विकार को स्वर संधि कहते हैं।

उदाहरण –

सूर्य + अस्त = सूर्यास्त

महा + आत्मा = महात्मा

स्वर संधि के भेद –

स्वर संधि के पांच भेद होते हैं

1. दीर्घ संधि

2. गुण संधि

3. वृद्धि संधि

4. यण  संधि

5. अयादि संधि

दीर्घ संधि की परिभाषा –

जब ह्रस्व व दीर्घ अ, इ, उ के बाद ह्रस्व व दीर्घ अ, इ, उ स्वर आए तो आ, ई, ऊ हो जाता है।

दीर्घ संधि का उदाहरण –

अ + अ = आ       स्व + अर्थी = स्वार्थी

अ + आ = आ      देव + आलय = देवालय

इ + इ = ई           कपि + इंद्र = कपींद्र

इ + ई = ई           गिरि + ईस = गिरीश

उ + उ = ऊ         गुरु + उपदेश = गुरुपदेश

उ + ऊ = ऊ        लघु + उर्मि = लघूर्मि

गुण संधि की परिभाषा –

यदि ‘अ’ और ‘आ’ बाद ‘इ’ या ‘ई’, ‘ओ’ या औ ‘ऋ’ स्वर आए तो इनके मिलने से क्रमशः ए ओ और अर् हो जाता है।

गुण संधि के उदाहरण –

अ + इ = ए         नर + इंद्र= नरेंद्र

आ + इ = ए        यथा + इस्ट = यथेष्ट

आ + ई = ए        रमा + ईश = उमेश

अ + उ = ओ       पर + उपकार = परोपकार

आ + उ = ओ      नव + उढा = नवो

आ + ऊ = ओ     महा + ऊर्जा = महोर्जा

अ + ऋ = अर्     ब्रह्म + ऋषि = ब्रह्मर्षि

आ + ऋ = अर्    महा + ऋषि = महर्षि

वृद्धि संधि की परिभाषा –

जब ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘ए’ या ‘ऐ’ आता है तो उनके मेल से ‘ऐ’ हो जाता है और ‘अ’ या ‘आ’ बाद ‘ओ’ या ‘औ’ आता है तो इनके मेल से ‘औ’ हो जाता है।

वृद्धि संधि के उदाहरण –

अ + ए = ऐ         एक + एक = एकैक

अ + ऐ = ऐ         मत + एक = मतैक्य

आ + ए = ऐ        सदा + एम = सदैव

आ + ऐ = ऐ        महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य

अ + ओ = औ      वन + औषधि = औषधि

अ + औ = औ      परम + औदार्य = परमौदार्य

आ + ओ = औ     महा + ओजस्वी = महौजस्वी

आ + औ = औ     महा + औषध = महौषध

यण संधि की परिभाषा –

जब ‘इ’, ‘ई’, ‘उ’, ‘ऊ’ और ‘ऋ’ के बाद कोई अलग स्वर आए तो ‘इ’ और ‘ई’ का ‘य’, ‘उ’ और ‘ऊ’ का ‘व’ तथा ‘ऋ’ का र् हो जाता है।

यण संधि का उदाहरण –

इ + अ = य      अति + अधिक = अत्यधिक

इ + उ = यु       ऊपरी + उक्त = उपर्युक्त

इ + ए = ये       प्रति + एक = प्रत्येक

ई + आ = या    देवी + आगमन = देव्यागमन

उ + अ = व      सु + अच्छ = स्वच्छ

उ + ए = वे       प्रभु + एषणा = प्रभ्वेषणा

ऊ + आ = वा   भू + आदि = भ्वादी

ऋ + अ = र      पितृ + अनुमति = पित्रनुमति

ऋ + आ = रा    मातृ + आज्ञा = मात्राज्ञा

ऋ + इ = रि      पितृ + इच्छा = पित्रिच्छा

अयादि संधि की परिभाषा –

जब ‘ए’, ‘ए’, ‘ओ’, ‘औ’ स्वरों का मेल दूसरे स्वर से होता है, तो ‘ए’ का ‘अय’, ‘ऐ’ का ‘आय्’, ‘ओ’ का ‘अव्’, ‘औ’ का ‘आव्’ हो जाता है।

अयादि संधि के उदाहरण –

ए + अ = अय           ने + अन = नयन

ऐ + अ = आय          नै + अक = नायक

ऐ + इ = आयि          नै + इका = नायिका

ओ + अ = अव         पो + अन = पवन

ओ +  = अवि           पो + इत्र = पवित्र

ओ + ई = अवी         गो + ईश = गवीश

औ + अ = आव        पौ + अक = पावक

औ + इ = आ            नौ + इक = नाविक

औ + उ = आवु         भौ + उक = भावुक

संधि विच्छेद की परिभाषा –

संधि के नियम द्वारा जुड़े वर्णों को फिर से मूल अवस्था में लाने की क्रिया को संधि विच्छेद कहते है।

संधि-विच्छेद का उदाहरण –

परीक्षार्थी   = परीक्षा + अर्थ

वागीश      = वाक् + ईश

रजनीश    = रजनी + ईश

संधि की परिभाषा
संधि

 

 

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पृथ्वी की उत्पत्ति || प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत || पंजिया महाद्वीप ||अंगारा लैंड ||गोंडवाना लैंड || प्लेट टेक्टोनिक सिद्धांत|| वैगनर का महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत|| हैरी हेस सिद्धांत || टेक्टोनिक कितने प्रकार के होते हैं || संरचनात्मक प्लेट || विनाशी प्लेट क्या होती है || संरक्षी प्लेट || भूकंप आने का कारण क्या है ||

पृथ्वी की उत्पत्ति –

पृथ्वी की उत्पत्ति – प्रारंभ में पृथ्वी आग का धधकता हुआ गोला थी। समय के साथ सिकुड़न प्रारंभ होने के कारण इसका बाहरी भाग सिकुड़ गया। कुछ समय बाद पृथ्वी के दो भाग बन गए।

  1. बाहरी भाग – पेंथालासा
  2. आंतरिक भाग – पेंजीया अर्थात आंतरिक भाग को भी दो भागों में बांटा गया है –
  • उत्तरी भाग – अंगारा लैंड
  • दक्षिणी भाग – गोंडवाना लैंड ( जम्बुद्वीप )

वर्तमान में उत्तरी गोलार्ध्द के देश अंगारालैण्ड के भाग है। जबकि दक्षिणी गोलार्ध्द के देश गोण्डवानालैण्ड के भाग है। भारत का उत्तरी भाग अंगारालैण्ड और दक्षिणी भाग गोण्डवाना लैण्ड का हिस्सा है। अंगारा और गोण्डवाना के बीच टेथिस सागर था। टेथिस सागर के स्थान पर बाद मे हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ।

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त –

यह एक सिद्धान्त है जो पृथ्वी के स्थलमण्डल मे बडे पैमाने पर होने वाली गतियो की व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसके द्वारा महाद्वीपों, महासागरों और पर्वतो के रूप में धरातलीय उच्चावच के तथा भूकम्प और ज्वालामुखी जैसी घटनाओं के भौगोलिक विवरण की व्याख्या करने का प्रयास है।

इस सिद्धान्त को हैरी हेस ने दिया था। इनके अनुसार पृथ्वी बहुत मोटे प्लेट टिकी है। इन प्लेटो की मोटाई 100 km होती है। महासागर के समीप ये प्लेटे पतली होती है। तथा महाद्वीपों पर इनकी मोटाई अधिक होती है। पृथ्वी पर कुल 7 बडे और 20 छोटे टेक्टोनिक प्लेट है। बड़ी प्लेटो के नाम निम्नलिखित है –

  1. उत्तरी अमेरिका प्लेट
  2. दक्षिणी अमेरिका प्लेट
  3. अंटार्कटिका प्लेट
  4. अफ्रीका प्लेट
  5. यूरेशिया प्लेट
  6. इंडो – आस्ट्रेलिया प्लेट
  7. प्रशांत महासागर प्लेट

प्लेटो के अभिसरण अर्थात टकराने से भूकम्प आते है। इन प्लेटों के टकराने से भूकम्प आता है अतः प्लेटों का किनारा भूकम्प का कारण होता है। प्रशान्त महासागरीय प्लेट सबसे अधिक प्लेटो से सीमा बनाती है अतः सबसे अधिक भूकम्प प्रशान्त महासागर मे आते है।

नेपाल यूरेशिया और इंडोआस्ट्रेलिया की सीमा पर स्थित है। अतः नेपाल एक अतिभूकम्प वाला देश है। अंटार्कटिका प्लेट के समीप कोई प्लेट के नहीं है। अतः वहा भूकम्प नही आता है। टेक्टोनिक प्लेट एस्थेनोस्फीयर मेंटल के ऊपर तैरती हैं।

प्लेट टेक्टोनिक सिद्धांत वैगनर के महाद्वीपीय विस्थापन के सिद्धांत का विकास माना जाता है। 1960 ईस्वी में महाद्वीपों के गतिशील होने की पुष्टि हुई। पूराचुंबकत्व से संबंधित साक्ष्य जिनके द्वारा सागर नितल प्रसरण की पुष्टि हुई है। हैरी हेस के द्वारा सागर नेतल प्रकरण की पुष्टि की गयी थी

टेक्टोनिक प्लेटो के प्रकार –

प्लेटो को उनकी गति या विस्थापन के अनुसार विभाजित किया गया है। टेक्टोनिक प्लेट तीन प्रकार के होते हैं।

संरचनात्मक प्लेट –

जब दो प्लेट एक दूसरे से दूर जा रहे होते हैं। उनके बीच में खाली स्थान बन जाता है। जिससे वहां से ज्वालामुखी विस्फोट होता है और आग्नेय चट्टाने बनती हैं। इसका प्रमुख उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक है।

विनाशी प्लेट –

जब दो प्लेटें आपस में टकराती हैं तो भारी प्लेट नीचे रह जाती है और हल्की प्लेट ऊपर उठ जाती है। जिससे वलित पर्वतों का निर्माण होता है। विनाशी प्लेटों के आपस में टकराने के कारण भूकंप आते हैं। हिमालय पर्वत विनाशी प्लेटों के द्वारा निर्मित वलित पर्वत है।

संरक्षी प्लेट –

जब प्लेटें ऊपर नीचे गति करती है तो इनको संरक्षी प्लेटे कहा जाता है। यह कोई विशेष प्रभाव नहीं डालते हैं।

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उत्तर का विशाल मैदान

रासायनिक अभिक्रिया की परिभाषा

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चट्टान की परिभाषा || चट्टान के प्रकार || चट्टाने कितने प्रकार की होती हैं ||आग्नेय चट्टान किसे कहते हैं || अग्नि चट्टान कितने प्रकार की होती है ||अवसादी चट्टान की परिभाषा || अवसादी चट्टानों में कौन-कौन से मुख्य खनिज पाए जाते हैं || रूपांतरित चट्टान किसे कहते हैं || शैल चक्र क्या होता है ||

चट्टान की परिभाषा –

 चट्टान की परिभाषा – पृथ्वी पर पाए जाने वाले कठोर पदार्थों को चट्टान कहते हैं। चट्टानों को मुख्य रूप से तीन भागो में विभक्त किया गया है।

  1. आग्नेय चट्टान
  2. अवसादी चट्टानें और
  3. रूपांतरित चट्टान

आग्नेय चट्टान –

आग्नेय चट्टानों का निर्माण ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा के जमने से होता है। इन्हें प्रारंभिक चट्टान कहा जाता है। इनके ऊपर भौतिक अपक्षय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि यह बहुत कठोर होती हैं। किंतु इनके ऊपर रासायनिक अपक्षय  का प्रभाव पड़ता है। आग्नेय चट्टान दो प्रकार की होती हैं।

  • बाह्य आग्नेय चट्टान
  • आंतरिक आग्नेय चट्टान

बाह्य आग्नेय चट्टान –

इन चट्टानों का निर्माण कब होता है। जब ज्वालामुखी से निकला लावा धरती से ऊपर आ जाता है। इन चट्टानों का रंग काला होता है।इन चट्टानों के घिसावट के कारण काली मिट्टी का निर्माण होता है। बेसाल्ट चट्टान – दक्षिण भारत में काली मिट्टी होने का मुख्य कारण बेसाल्ट चट्टानों का होना है।

आंतरिक आग्नेय चट्टान –

इन चट्टानों का निर्माण तब होता है जब लावा भूमि के ऊपर ना आकर बल के अंदर ही रह जाए। ये चट्टानें दो प्रकार के होते हैं।

  • पातालिका
  • मध्यवर्ती

पातालिका – यदि लावा बहुत गहराई में ही रह जाता है पातालिका चट्टानों का निर्माण होता है। पतालिका चट्टानों के उदाहरण –

  • ग्रेनाइट
  • गैवोरा

मध्यवर्ती आग्नेय चट्टान – इन चट्टानों का निर्माण तब होता है जब लावा भूमि के सतह तक ही पहुंचे यानी कम गहराई पर ही रह जाए। चट्टानों को आकार के हिसाब से कई भागों में बांटा गया है।

  • लैकोलिथ यह संरचना में गुंबद के समान होते हैं।
  • लैपोलिथ इनकी संरचना तस्करी के समान होती है।
  • फेकोलिथ यह चट्टाने उबड़ खाबड़ संरचना में पाए जाते हैं। 
  • शील – क्षैतिज रूप में लेटी रहती हैं।
  • डाईक – यह लोहे के सामान लंबवत खड़े रहते हैं।

अवसादी चट्टानें –

इन चट्टानों का निर्माण आग्नेय चट्टानों के अपक्षय या टूटने फूटने के कारण होता है। यह निक्षेपण कई परतों में जमने से बनता है इसलिए इसे परतदार चट्टाने भी कहा जाता है। अवसादी चट्टानों को तलछट्टी चट्टान, ईंधन चट्टान, द्वितीयक चट्टान भी कहते होते हैं। प्राकृतिक गैस पेट्रोलियम कोयला आदि की प्राप्ति अवसादी चट्टानों से होती है। अतः इसे ईंधन चट्टान भी कहा जाता है। अवसादी चट्टानों के मुख्य उदाहरण –

  • बलुआ पत्थर
  • बालूकाश्म
  • चिकनी मिट्टी
  • चूना पत्थर
  • खड़िया
  • कोयला आदि।

कोयला –

यह एक प्रकार की ईंधन चट्टान है। कोयला एक कार्बनिक पदार्थ है जिसका उपयोग इधन के रूप में किया जाता है कोयला को कार्बन की प्रतिशत मात्र के अधर पर मुख्य रूप से चार प्रकार में बता गया है ।

  • एन्थ्रासाइट
  • बिटुमिनस
  • लिग्नाइट
  • पीट

रूपांतरित चट्टानें – ( Metamorphic Rock )

इन चट्टानों का निर्माण आग्नेय और अवसादी शैलो में ताप एवं दाब के कारण परिवर्तन और रूपांतरण के कारण होता है। इस वजह से उनको कायांतरित शैल भी कहा जाता है। पृथ्वी की पपड़ी के एक बड़े हिस्से में बनी होती है बनावट रासायनिक और खरीद संयोजन द्वारा इनको अलग किया जाता है रूपांतरित स्थानों के मुख्य उदाहरण संगमरमर क्वार्टजाइट, नीस, शीस्ट, फाइलाइट, स्लेट आदि

शैल चक्र –

शैल चक्र का तात्पर्य चट्टानों के अपने रूप में होने वाले परिवर्तन से है। पहले अपने मूल रूप में बहुत अधिक समय तक नहीं रहते हैं। बल्कि यह परिवर्तित होती रहते हैं आग्नेय शैल प्राथमिक सैल है तथा अवसादी और कायांतरित शैले इसी से बनती है। आग्नेय और कायांतरित शैलो के अपक्षय से अवसादी शैल का निर्माण होता है।

चट्टान की परिभाषा
शैल चक्र

निर्मित भूपृष्ठीय चट्टानों यानी आग्नेय, कायांतरित और अवसादी चट्टान का प्रत्यावर्तन के द्वारा पृथ्वी के अंदर चली जाती हैं और पृथ्वी के आंतरिक भाग में तापमान और दाब बढ़ने के कारण के पिघलकर मैग्मा में परिवर्तित हो जाती है। यही मैग्मा शैलों का मूल स्रोत है।

पृथ्वी की चट्टानों में तत्वों की मात्रा –

O > Si > Al > Fe > Ca > Na

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पर्वत किसे कहते है, प्रकार और उदाहरण

विश्व के प्रमुख घास के मैदान

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भारत का भूगोल

ज्वालामुखी किसे कहते है ||ज्वालामुखी के प्रकार || सुषुप्त ज्वालामुखी || सक्रिय ज्वालामुखी ||मृत ज्वालामुखी || ज्वालामुखी गीजर क्या होता है || हजारों धुआरों का शहर कहां स्थित है || क्रेटर झील कैसे बनते हैं || विश्व के सक्रिय ज्वालामुखी कौन-कौन से हैं ||

ज्वालामुखी किसे कहते है –

ज्वालामुखी किसे कहते है – पृथ्वी के मैंटल से तरल मैग्मा इस क्रिया द्वारा धरती के गर्भ से बाहर निकलता है। जब संरचनात्मक प्लेटे एक दूसरे से दूर जा रही होती है तो इनके बीच खाली स्थान बन जाता है। इससे लावा बाहर निकलने लगता है और इसे ज्वालामुखी विस्फोट कहते है।

  • मैग्मा जब ठंडा हो जाता है तो उसे लावा कहते हैं।
  • जब मैग्मा का जवाब पानी में हो जाता है तो उसे कहते हैं।
  • जब मैग्मा का जमाव चने की आकृति समान हो जाए तो उसे इस स्कोरिया कहते हैं।
volcano

ज्वालामुखी से मैग्मा जिस छिद्र से बाहर निकलता है उसे ज्वालामुखी छिद्र कहते हैं। जब ज्वालामुखी छिद्र बड़ा हो जाता है तो उसे क्रेटर कहा जाता है।

Crator

ज्वालामुखी से निकलने वाली गैस – SO2, CO2, रेडान।

ज्वालामुखी गीजर किसे कहते है –

एक प्रकार का पानी का चश्मा अर्थात् ज्वालामुखी की तरह ही होता है। जिसमें समय-समय पर पानी के जोरों से शक्तिशाली फव्वारे की भांति फूटता है और साथ में भाप मिट्टी और उसके रास्ते में आने वाली अशुद्धियों को मिली होती है। अलास्का में बहुत अधिक गीजर पाए जाते हैं अतः अलास्का को हजारों धुआरों का शहर कहा जाता है।

ज्वालामुखी के प्रकार –

सक्रियता के आधार पर ज्वालामुखी को तीन भागों में विभाजित किया गया है।

  • सक्रिय ज्वालामुखी
  • सुषुप्त ज्वालामुखी
  • मृत ज्वालामुखी

सक्रिय ज्वालामुखी –

ऐसे ज्वालामुखी जिनमें हमेशा विस्फोट होता रहता है। और यह सबसे घातक होते हैं उनको सक्रिय ज्वालामुखी कहा जाता है। सक्रिय ज्वालामुखी के उदाहरण  –

  1. भारत – बैरन
  2. इक्वाडोर – कोटोपैक्सी
  3. इटली – एटना, स्ट्रांबोली (सिसली द्वीप)
  4. यूएसए – स्पर
  5. रूस – बेंजामियामी
  6. इंडोनेशिया – सुमेरू
  7. तंजानिया – किलिमंजारो
  8. अंटार्कटिका – इरेबस

सुषुप्त ज्वालामुखी –

जिनमें वर्तमान में कोई भी  विस्फोट नहीं हो रहा किंतु कभी भी विस्फोट हो सकता है। सुषुप्त ज्वालामुखी के उदाहरण –

  1. इटली – विसुवियस
  2. जापान – फ्युजियामा
  3. इंडोनेशिया सिनाका, क्रोकाटावा

मृत ज्वालामुखी –

ऐसे ज्वालामुखी जिनमे अब कभी भी विस्फोट नहीं होता। उदाहरण –

  1. भारत में नारकोंडम
  2. म्यांमार में पोपा ज्वालामुखी
  3. ईरान में देवबंद कोहेसुल्तान
  4. हवाई द्वीप में मोनालोवा

ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा में जिप्सम पाया जाता है, साथ में अनेक हानिकारक गैस जैसे SO2 रेडान कार्बन डाइऑक्साइड भी निकलते हैं। सबसे अधिक ज्वालामुखी प्रशांत महासागर में पाए जाते हैं। जिसको अग्नि वलय कहा जाता है। ( फायर रिंग ऑफ पेसिफिक ओसियन Fire Ring of Pacific Ocean )

  • सबसे अधिक ज्वालामुखी वाला देश – इंडोनेशिया
  • विश्व का सबसे ऊंचा सक्रिय ज्वालामुखी – कोटोपैक्सी
  • सबसे ऊंचाई पर स्थित ज्वालामुखी – ओजस डेलसलाडो
  • सबसे ऊंचा ज्वालामुखी अमेरिका महाद्वीप के हवाई द्वीप पर स्थित – मोनालोआ ज्वालामुखी

सबसे सक्रिय ज्वालामुखी इटली का स्ट्रांबोली है इसे भूमध्य सागर का प्रकाश स्तंभ भी कहते हैं।

  • ज्वालामुखी को पृथ्वी का सुरक्षा वाल्व भी कहा जाता है। ओजोन को पृथ्वी का सुरक्षा कवच करता है। ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में कोई भी ज्वालामुखी नहीं है।

* ज्वालामुखी किसे कहते है *

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विश्व के प्रमुख घास के मैदान

उत्तर भारत का विशाल मैदानी भाग

दक्षिण भारत का प्रायद्वीपीय पठार

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उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र || हिमालय पर्वत का विस्तार || हिमालय का पर्वतीय प्रदेश ||भारत के भौतिक प्रदेश ||हिमालय पर्वतीय क्षेत्र का वर्णन || हिमालय को कितने भागो में बाटा गया है || हिमालय का प्रादेशिक विभाजन || ट्रांस हिमालय || बृहद हिमालय ||शिवालिक हिमालय || मध्य हिमालय || हिमालय की मुख्य पर्वत श्रेणियाँ || पंजाब हिमालय || कुमायूं हिमालय || नेपाल हिमालय ||असम हिमालय|| अराकान योमा किस पर्वत का हिस्सा है||

उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र –

उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र अर्थात हिमालय पर्वत के स्थान पर पहले टेथिस सागर हुआ करता था। जो भारतीय प्लेट तथा यूरेशियन प्लेट के बीच लगे संपीडन बल के कारण पर्वत का रूप धारण किया। जिसका विस्तार नंगा पर्वत से लेकर नामचा बरवा पर्वत तक चापीय आकृति में है। यह पटकाई बूम से लेकर अराकानयोमा तक पूर्वांचल पहाड़ियों के रूप में जाना जाता है। समुद्र में विलीन होते हुए अंडमान एवं निकोबार दीप समूह तक फैला हुआ है। हिमालय को भारत के सजग प्रहरी के रूप में जाना जाता है।

हिमालय का प्राकृतिक विभाजन –

उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र को प्राकृतिक दृष्टि से देखे तो यह चार श्रेणियों में बाॅटा गया है।

1. ट्रांस हिमालय

2. वृहद हिमालय

3. मध्य हिमालय

4. शिवालिक हिमालय

ट्रांस हिमालय  – Trans Himalaya

यह भाग यूरेशियन प्लेट का हिस्सा है। इसे तिब्बती हिमालय या टेथीस हिमालय भी कहा जाता है। यह हिमालय का सबसे प्राचीनतम भाग है। ट्रांस हिमालय का निर्माण अवसादी चट्टानो से हुआ है। यहाॅ पर रार्शिरो से लेकर कैम्ब्रियन युग तक की चट्टाने मिलती है। और इस पर वनस्पतियों का अभाव है। ट्रांस हिमालय को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है।

a. कराकोरम

b. लद्दाख

c. जास्कर

d. पीरपंजाल

कराकोरम पर्वत श्रेणी-  इसकी प्रमुख चोटियां गॉडविन ऑस्टिन 8621 मीटर और गए सर बूम 8035 मीटर है। कराकोरम श्रेणी उत्तर मे पामीर की गांठ से मिलती है और दक्षिण – पूर्व दिशा में कैलाश पर्वत के रूप में विकसित हुई है।

लद्दाख श्रेणी – सिंधु और उसकी सहायक श्योक नदी के बीच जल विभाजक का कार्य करते हैं। विश्व की सबसे बड़ी ढाल वाली चोटी राकापोशी है। राकापोशी लद्दाख श्रेणी की सबसे ऊंची चोटी भी है।

काराकोरम श्रेणी के मुख्य ग्लेशियर निम्न है – 

सियाचिन ग्लेशियर – 72 km

हिस्पर – 61 km 

बाल्टोरों – 62 km

बीयाफो – 63 km

2. वृहद हिमालय-

वृहद हिमालय को आंतरिक, महान, सर्वोच्च हिमालय, हिमाद्री और मुख्य हिमालय भी कहते हैं। यह हिमालय की सबसे ऊंची और दुर्गम श्रेणी है। वृहद हिमालय की औसत ऊंचाई 6100 मीटर है और यहां पर हमेशा बर्फ जमी रहती है। इसका विस्तार नंगा पर्वत से लेकर नामचा बरवा तक है।

पश्चिम से पूरब की तरफ चोटियों का क्रम नंगा, बंदरपूंछ, कामेद, नंदा, धौलागिरी, अन्नपूर्णा, मनसालू, गौरीशंकर  छुयू, एवरेस्ट, मैकालू, कंचनजंगा, नामचा बरवा है। बंदरपूंछ और कामेद पर्वत के बीच यमुनोत्री, गंगोत्री, त्रिशूल, बद्रीनाथ और केदारनाथ स्थित है।

सबसे ऊंची चोटी – माउंट एवरेस्ट 8850 मी नेपाल में इसे सागरमाथा और चीन में चामुलोंगमा ( पर्वतों की रानी ) भी कहते हैं।

वृहद हिमालय में पाए जाने वाले मुख्य हिमनद –  कुमायूं हिमालय में मिलाम और गंगोत्री हिमनद,  सिक्किम में जेमू हिमनद ( 20 किमी )

वृहद हिमालय से अनेक नदियों का उद्गम होता है जिसमें गंगा और यमुना मुख्य है। वृहद हिमालय के मुख्य दर्रे कश्मीर में जोजिला और बुर्जिला है।

3. मध्य हिमालय या लघु हिमालय –

इनकी औसत ऊंचाई अट्ठारह सौ से 3000 मीटर है जबकि चौडाई 80 से 100 किलोमीटर तक है। पीर पंजाल श्रेणी इसका पश्चिमी विस्तार है। पीर पंजाल और बनिहाल दर्रे इसी के अंतर्गत हैं।

लघु हिमालय पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है। मध्य हिमालय पर स्थित मुख्य पर्यटन स्थल कुल्लू, मनाली, मसूरी  शिमला  डलहौजी नगर, नैनीताल और रानीखेत है। लघु हिमालय में प्रमुख घाटियां कश्मीर घाटी, कुल्लू घाटी, कांगड़ा घाटी, काठमांडू घाटी आदि है।

लघु हिमालय में ढ़ालों पर छोटे-छोटे घास के मैदान बहुतायत पाए जाते हैं। इन मैदानों को कश्मीर में मर्ग कहा जाता है, उदाहरण के लिए गुलमर्ग और सोनमर्ग। उत्तराखंड में इन घास के मैदानों को बुग्यास या पयार कहा जाता है।

4. शिवालिक श्रेणी –

उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र के इस भाग को उप हिमालय, बाह्य हिमालय, नवीन हिमालय या हिमालय की पदस्थली भी कहते हैं। शिवालिक श्रेणी की औसत ऊंचाई 1000 से 2500 मीटर तक है। पूर्व में इसकी चौड़ाई 15 किलोमीटर है और पश्चिम में पंजाब व हिमाचल में लगभग 50 किलोमीटर तक है। शिवालिक और मध्य हिमालय के बीच में अनेक घाटियां हैं। पश्चिम में स्थित घाटियों को दून कहते हैं – देहरादून। पूर्व में स्थित घाटियों को द्वार कहते हैं – हरिद्वार।

शिवालिक हिमालय को ही पाकिस्तान में सुलेमान और म्यांमार में अराकानयोमा कहा जाता है। अरुणाचल प्रदेश में डाफ्ला, मिरी, अबोर, मिस्मी और पटकाई बूम पहाड़ियां शिवालिक का हिस्सा है।

नागालैंड में – नागा पर्वत मिजोरम में – मिजो पहाडियाॅ

असम में – मिकिर पहाड़ी

पूर्वोत्तर राज्यों में शिवालिक श्रेणी को पूर्वांचल पर्वत भी कहते हैं। शिवालिक का दक्षिण – पूर्व सुदूर भाग जो कि समुद्र में भी डूबा हुआ है। अंडमान निकोबार दीप समूह इसी का हिस्सा है।

हिमालय का प्रादेशिक विभाजन – Regional devision of Himalaya

उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र मे से ट्रांस हिमालय का निर्माण सबसे पहले हो गया था। यहां से सिंधु, सतलज, काली नदी, महानंदा, तिस्ता और ब्रह्मपुत्र नदी निकलती है। उन्होंने नवीन हिमालय के विकास में बाधा उत्पन्न की और अपने मार्ग में गार्ज का निर्माण किया। सर सिडनी  पुराण के द्वारा पूर्व से पश्चिम की ओर प्रादेशिक विभाजन की दृष्टि से चार भागों में बांटा गया है यह विभाजन हिमालय में घाटियों को आधार मानकर किया गया है

पंजाब या कश्मीर हिमालय – Punjab Himalaya

यह सिंधु और सतलज नदी के बीच विस्तृत है। इसकी लंबाई 560 किलोमीटर है। कश्मीर हिमालय करेवा (चिकनी चट्टानी मिट्टी) झीलीय निक्षेपो के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर जाफरान की खेती होती है।

कुमायूं हिमालय – Kumaun Himalaya

इसका विस्तार सतलज और काली नदीयों के मध्य है। इस के पश्चिमी भाग को गढ़वाल हिमालय और पूर्वी भाग को कुमायूं हिमालय कहा जाता है। यह पंजाब हिमालय की अपेक्षा अधिक ऊंचा है। इसका सर्वोच्च शिखर नंदा देवी 7817 मीटर है।

नेपाल हिमालय –

इसका विस्तार काली और महानदी के मध्य है यह सबसे लंबा भाग 800 किलोमीटर है यह नेपाल में फैला हुआ है विश्व का सर्वाधिक ऊंची – ऊंची चोटियां इसी का हिस्सा है एवरेस्ट कंचनजंगा

असम हिमालय –

असम हिमालय का विस्तार सिक्किम में तिस्ता नदी से लेकर अरुणाचल में ब्रह्मपुत्र (दिहांग नदी) तक है। इसकी लंबाई लगभग 760 किमी है।

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उत्तर का विशाल मैदानी भाग

प्रायद्वीपीय भारत का पठार

भारत के द्वीप समूह

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भारत का भूगोल

पर्वत किसे कहते हैं || पर्वत के प्रकार ||वलित पर्वत क्या होता है || वलित पर्वत के उदाहरण || अपशिष्ट पर्वत कौन कौन से हैं || पर्वतों का निर्माण कैसे होता है || ज्वालामुखी पर्वत की परिभाषा ||

पर्वत किसे कहते है –

पर्वत या पहाड़ी पृथ्वी की भू सतह पर प्राकृतिक रूप से उभरा या उठा हुआ हिस्सा होता है। यह अधिकतर आकस्मिक तरीके से उभरा होता है और इसकी ऊंचाई पहाड़ी से अधिक होती है। पर्वत की उचाई लगभग 1000 फीट से ऊपर होती है और पठार से अधिक होती है

Mountain

पर्वतों का निर्माण कैसे होता है –

नवीन पर्वत या वलित पर्वतों का निर्माण बिनाशी टेक्टोनिक प्लेटों के आपस में टकराने के कारण होता है। टक्कर के उपरांत भारी प्लेट का घनत्व अधिक होने के कारण नीचे धंस जाती है जबकि हल्की प्लेट उपर उठ जाती है। जिसके कारण यह प्लेटे मुड़कर ऊपर उठ जाती है और पर्वत का निर्माण होता है।

पर्वत मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं।

  1. वलित पर्वत
  2. ज्वालामुखी पर्वत
  3. अवशिष्ट पर्वत
  4. हार्ज पर्वत / भ्रंशोत्थ पर्वत

वलित पर्वत –

दुनिया में स्थित लगभग सभी बड़े और ऊंचे पर्वत इसके उदाहरण है। उनको मोड़दार पर्वत और नवीन पर्वत भी कहा जाता है। उनका निर्माण विनाशी चट्टानो के आपस में संकुचन से होता है। वलित पर्वत के उदाहरण –

  • हिमालय
  • आल्पस
  • एण्डीज
  • राकी
  • कुनलुनशान
  • अराकानयोमा
  • ग्रेट डिवाइडिंग रेंज
  • पिरेनीज
  • ड्रैकन्सबर्ग आदि है।

ज्वालामुखी पर्वत –

इन पर्वतों का निर्माण ज्वालामुखी के उद्गार के फल स्वरुप होता है। इनको दो भागों में बांटा गया है

  • सिण्डर
  • मिश्रित ज्वालामुखी पर्वत

सिण्डर – जब ज्वालामुखी से निकले मैग्मा से बने हुए पर्वतों में सिर्फ राख पाई जाती है तो उसको सिण्डर कहते हैं।

मिश्रित ज्वालामुखी – जब ज्वालामुखी से निकले मैग्मा में राख के अलावा चट्टानें, खनिज लवण, कोयला जीवाश्म और भी पदार्थ पाई जाती हैं। तो इस तरह के पर्वत मिश्रित ज्वालामुखी पर्वत कहलाते हैं।

  • फ्यूजीयामा – जापान
  • मोनालोमा – हवाई द्वीप USA
  • किलिमंजारो – तंजानिया
  • विसुवियस – इटली
  • कोटोपैक्सी – इक्वाडोर

अवशिष्ट पर्वत –

यह बहुत पुराने पर्वत होते हैं और अब इनका निर्माण नहीं होता है। इन पर्वतों का धीरे-धीरे नदियों द्वारा अपरदन और अपक्षय होता है। यह पर्वत लगभग समाप्त होने वाले है। अवशिष्ट पर्वत के उदाहरण –

  • अरावली
  • पारसनाथ (बिहार)
  • अपलेसियन
  • यूराल पर्वत

हार्ज पर्वत –

जब पृथ्वी की ऊपरी चट्टानों में भ्रन्सन के कारण जब किनारे के भूभाग नीचे धंस जाता है बीच की चट्टानें ऊपर उठ जाती है। इस प्रकार बड़े पर्वत को हार्ज पर्वत कहते हैं। हार्ज पर्वत के उदाहरण – जर्मनी का वासजेज पर्वत

भ्रंशोत्थ पर्वत ( Block Mountain ) –

ब्लॉक पर्वत का निर्माण पृथ्वी की सतह में भ्रंसन के द्वारा जब बीच वाला भाग ऊपर उठ जाता है या बहुत भागों के टूट कर उधर उर्धवाधर रूप से विस्थापित होने के कारण ऊपर उठे भागो के द्वारा भ्रंशोत्थ पर्वत बनता है। और इस प्रक्रिया में नीचे धसे भाग को भ्रंश घाटी कहते हैं। भ्रंशोत्थ पर्वत के उदाहरण – विन्ध्य पर्वत श्रेणी, ब्लैक फॉरेस्ट पर्वत जर्मनी। भ्रंश घाटी के उदाहरण – राइन नदी, नर्मदा नदी, ताप्ती नदी

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उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का वर्णन

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भारत का भूगोल

भारत का मरुस्थलीय क्षेत्र || थार का मरुस्थल || मरुस्थल के प्रकार || लद्दाख का मरुस्थल किस प्रकार का मरुस्थल है || लद्दाख का मरुस्थल ||

भारत का मरुस्थलीय क्षेत्र –

भारत का मरुस्थलीय क्षेत्र भारतीय भूमि पर ऐसे क्षेत्र है। जहा 25 सेमी / वर्ष या इससे कम जलपात होती है। जलपात का मतलब वर्षा और हिमपात दोनों से है। सामायन्तः लोग मरुस्थल का मतलब रेतीले और गर्म भाग मानते है। लेकिन ऐसा नही है मरुस्थल गर्म और ठन्डे दोनों हो सकते है। जैसे थार का मरुस्थल गर्म और रेतीला है। परन्तु अंटार्कटिक प्रदेश बर्फ से ढका और ठंडा भी है।

मरुस्थल का सामान्य गुण कम वर्षा, बहत कम आबादी, कम वनस्पति, जल स्रोतों की कमी, आदि है। रेत के कारण यहाँ पर दैनिक तापान्तर बहुत अधिक होता है।

मरुस्थल के प्रकार –

कटिबंधों के आधार पर मरुस्थल को तीन भागों में बांटा गया है। उष्णकटिबंधीय मरुस्थल, शीतोष्ण कटिबंधीय मरुस्थल और शीत मरुस्थल। वैसे मरुस्थल मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। जिनका वर्णन निम्न प्रकार है –

a. शुष्क मरुस्थल –

ऐसे मरुस्थल जहा तापमान बहुत अधिक होता है और वर्षा बहुत कम होती है। सहारा विश्व का सबसे बड़ा शुष्क मरुस्थल है। भारत का थार मरुस्थल भी शुष्क मरुस्थल है।

b. शीत मरुस्थल –

यह शुष्क मरुस्थल से बिलकुल अलग होते है। उच्च पर्वत शिखरों और ध्रुवों पर शीत ऋतू में बहुत अधिक बर्फ़बारी के कारण निर्जन प्रदेश बन जाता है। यहा अधिक ठंड के कारण वनस्पतियाॅ बहुत कम मिलती है। अंटार्कटिक प्रदेश और भारत में लद्दाख शीत मरुस्थल है।

थार मरुस्थल – थार का रेगिस्थान ( Thar Desert )

भारत में अरावली पर्वत के उत्तर – पश्चिम और पश्चिमी किनारे पर बालू के टीलो से ढका हुआ एक मरुस्थलीय मैदान है। इस विस्तृत मरुस्थलीय मैदान को थार का मरुस्थल कहा जाता है। इसका विस्तार मुख्य रूप से राजस्थान, कुछ हिस्सा पंजाब, हरियाणा और गुजरात में भी फैला है। थार के मरुस्थल का विस्तार पाकिस्तान मे भी है। वहाँ इसको चोलिस्तान का मरुस्थल कहा जाता है।

ढाल के आधार पर दो भागों में बाटा गया है –

a. उत्तरी भाग – इसका ढाल पाकिस्तान के सिंध प्रान्त की ओर है।

b. दक्षिणी भाग – इसका ढाल कच्छ के रन की तरफ है।

इस मरुस्थल की अधिकांश नदियाँ में सिर्फ बारिश के मौसम में जल मिलता है। इसकी अधिकांश नदिया अन्तः स्थलीय प्रवाह प्रतिरूप का उदाहरण है। लूनी इस क्षेत्र की प्रमुख नदी है

विश्व के सभी मरुस्थलीय क्षेत्रों में से सर्वाधिक जनसँख्या घनत्व थार के मरुस्थल में ही है।

कच्छ के रन को सफ़ेद मरुस्थल कहा जाता है। यह क्षेत्र एक प्रकार से नमकीन दलदल से बना है, और हजारो वर्ग किमी भाग पर फैला हुआ है।

लद्दाख का शीत मरुस्थल –

लद्दाख जम्मू कश्मीर के पूर्व स्थित एक ऊचा पठारी भाग है यह हिमालय और काराकोरम पर्वतों की घाटियों में स्थित है। यह भारत के सबसे कम विरल जनसँख्या वाले क्षेत्रो में एक है यहाँ शीत ऋतू में बहुत अधिक बर्फ़बारी होती है। जिसकी वजह यहाँ वनस्पतिया नहीं पाई जाती है। गर्मी के समय यहाँ सेब और अखरोट की खेती होती है। यहाँ पानी एकमात्र स्रोत बर्फ और ग्लेसियर का पिघलना है।

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भारत के द्वीप समूह कौन-कौन से हैं

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भारत का भूगोल

भारत का तटीय मैदान || पश्चिमी तटीय मैदान || पूर्वी तटीय मैदान || भारत के तटीय मैदान का निर्माण कैसे हुआ || गुजरात का तटीय मैदान || कोंकण का तटीय मैदान ||कन्नड़ का मैदान || कोरोमंडल तट || कोल्लेरू झील कहां स्थित है|| Coastal planes of India || Western Coastal planes of India ||

भारत का तटीय मैदान –

भारत का तटीय मैदान प्रायद्वीपीय पठार के पर्वतों और समुद्र तट के बीच फैला हुआ है। इस मैदान का निर्माण सागरीय तरंगो द्वारा अपरदन और निक्षेपण के द्वारा हुआ है। इसके निर्माण में पठारी नदियों के द्वारा लाये गए अवसादो के जमाव से हुआ है। भारत का तटीय मैदान मुख्य रूप से दो भागो में बाटा गया है। यह मैदान उत्तर के विशाल मैदान से प्राकृतिक और संरचना रूप से बिल्कुल अलग है।

  • 1 पूर्वी तटीय मैदान

2. पश्चिमी तटीय मैदान

पश्चिमी तटीय मैदान –

पश्चिमी घाट पर्वत और अरब सागर के बिच बना मैदान पश्चिमी तटीय मैदान कहा जाता है। इसका विस्तार गुजरात के सूरत से कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। इसको चार भागो में बाटा गया है।

a. गुजरात का तटीय मैदान – इसको कच्छ या कठियावाड या सौराष्ट्र का तटीय मैदान कहा जाता है।

b. कोंकण का तटीय मैदान – इसका विस्तार दमन ( महाराष्ट्र ) से गोवा है इस तट पर साल, सागौन, आदि वनों की अधिकता है।

c. कन्नड़ का मैदान – गोवा से मंगलुरु के बीच फैला हुआ है। कन्नड़ तट गरम मसालों, सुपारी, नारियल आदि की खेती के लिए प्रसिद्द है।

d. मालाबार का तट – इसका विस्तार मंगलुरु से कन्याकुमारी ( केप कामोरिन ) के बीच विस्तृत है। इस मैदान में कयाल या लैगून पाए जाते है। इनका प्रयोग मछली पकड़ने, अंतर्देशीय जल परिवहन के अलावा पर्यटन स्थलों के लिए किया जाता है।

यह मैदान गुजरात में सबसे चौड़ा है और दक्षिण की ओर चलने पर इसकी चौड़ाई कम हो जाती है। केरल में फिर से चौड़ा हो जाता है।

पुन्नामदा कायाल– केरल में प्रतिवर्ष नेहरु ट्राफी वल्ल्कामी नौका प्रतियोगिता का आयोजन इसी कयाल में होता है।

पश्चिम तटीय मैदान जलमग्न तटीय मैदान के उदाहरण है। यह अधिक कटा फटा तट है, जिससे यह पत्तनो और बन्दरगाहो के विकास की प्राकृतिक परिस्थितिया प्रदान करती है।

पूर्वी तटीय मैदान –

पूर्वी घाट पर्वतो और बंगाल की खाड़ी के बीच बने मैदान को पूर्वी तटीय मैदान कहा जाता है। इसका विस्तार स्वर्णरेखा नदी से कन्याकुमारी तक है। पूर्वी तटीय मैदान को तीन भागो में बाटा गया है।

a. उत्कल तट – स्वर्णरेखा नदी से महानदी तक,( उड़ीसा मे ) कहा जाता है।

b. उत्तरी सरकार तट – महानदी से कृष्णा नदी के बीच फैला हुआ है, उड़ीसा और आँध्रप्रदेश राज्यो में।

c. कोरोमंडल तट – कृष्णा नदी से कन्याकुमारी तक विस्तृत है, यह आँध्रप्रदेश और तमिलनाडु राज्यों तक फैला है।

पूर्वी तटीय मैदान पर दक्षिणी पश्चिम मानसून और उत्तर पूर्वी मानसून दोनों के द्वारा बारिश होती है। भारत का तटीय मैदान के पूर्वी भाग में चिकनी मिट्टी मुख्यतः पाई जाती है, इसकी वजह से यहाँ मुख्य रूप से चावल की खेती होती है।

चिल्का और पुलीकट झील दोनों लैगून झीले पूर्वी तट पर स्थित है। गोदावरी और कृष्णा नदियों के डेल्टा में कोल्लेरू झील है। पूर्वी तटीय मैदान की नदिया अपने मुहाने पर डेल्टा बनती है, जबकि पश्चिमी तटीय मैदान की नदियाँ अश्चुरी का निर्माण करती है।

पूर्वी तटीय मैदान पर स्थित डेल्टा का नाम उत्तर से दक्षिण की तरफ –

महानदी डेल्टा – उड़ीसा

गोदावरी डेल्टा – आंध्रप्रदेश

कृष्णा नदी डेल्टा – आंध्रप्रदेश

कावेरी डेल्टा – तमिलनाडु

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विश्व के प्रमुख घास के मैदान

कांस्य युग का इतिहास

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भारत का भूगोल

भारत के द्वीप समूह || अंडमान और निकोबार द्वीप समूह || लक्षद्वीप समूह ||श्रीहरिकोटा द्वीप || पंबन द्वीप || न्यू मूर द्वीप || अब्दुल कलाम द्वीप || व्हीलर द्वीप || माजुली द्वीप || भारत के नदीय द्वीप || Indian islands || Andman Nikobar || andrott island ||

भारत के द्वीप समूह –

भारत के द्वीप समूह – द्वीप ऐसे स्थलखंड है जो चारो तरफ से जल से घिरे होते है। ये आकार में बहुत छोटे से बहुत बड़े तक हो सकते है। अधिकतर द्वीप समुद्र में होने वाले ज्वालामुखी विस्फोट से बने है। कुछ द्वीपों का निर्माण नदियों द्वारा लाये गए अवसादो के जमाव से भी होता है। विश्व के प्रमुख द्वीप मेडागास्कर, श्रीलंका, हवाई द्वीप, जापान आदि है।

भारत के द्वीप समूह
port blair

भारत में द्वीपों की कुल १०२८ है, जिसमे निर्जन द्वीप भी शामिल है। इसमें से कुछ द्वीप भारत के तटीय भाग से नजदीक और कुछ बहुत दूरी पर है। भारत के द्वीप समूह को मुख्य रूप से दो भागो में बाॅटा गया है।

1. अंडमान निकोबार द्वीप समूह

2. लक्षद्वीप समूह

3. श्री हरिकोटा द्वीप

4. पंबन द्वीप

5. न्यू मूर द्वीप

6. अब्दुल कलाम द्वीप ( व्हीलर द्वीप )

7. माजुली द्वीप ( नदी द्वीप )

अंडमान निकोबार द्वीप समूह –

ये द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी में स्थित है। यह 572 छोटे – बड़े द्वीपों से मिलके बना है । यह द्वीप समूह समुद्र में डूबे पर्वतो का भाग है, जो हिमालय का विस्तार माना जाता है। यहाँ कुछ द्वीपों या पर्वतो का निर्माण ज्वालामुखी क्रिया से हुआ है। इन द्वीपों को मुख्य रूप से दो भागो में बता गया है – अंडमान और निकोबार । 10 डिग्री उत्तरी अक्षांश ( 10 चैनेल ) अंडमान द्वीप को निकोबार से अलग करता है

अंडमान निम्न द्वीपों का समूह है –

a. उत्तरी अंडमान

b. मध्य अंडमान

c. दक्षिणी अंडमान अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर अंडमान द्वीप पर है

d. लिटिल अंडमान

निकोबार निम्नलिखित द्वीपों का समूह है

a.कार निकोबार

b. लिटिल निकोबार

c. ग्रेट निकोबार – यह भौगोलिक रूप से सुमात्रा द्वीप के सबसे करीब स्थित भारतीय द्वीप या क्षेत्र है। इंदिरा पॉइंट जो भारत का सबसे दक्षिणतम बिंदु है, इसी द्वीप पर है। यह 2004 में आई सुनामी के कारण समुद्र में डूब गया। इंदिरा प्वाइंट ( INDIRA POINT )का दूसरा नाम पिग्मेलियन प्वाइंट है।

अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर स्थित पर्वत चोटिया

सैंडल पीक – उत्तरी अंडमान ( 738 मी ) यह अंडमान निकोबार द्वीप समूह की सबसे ऊची छोटी है।

b. माउंट डियोवोली – मध्य अंडमान ( 515 मी )

c. माउंट कोयोब – दक्षिण अंडमान ( 460 मी )

d. माउंट थुइल्लर – ग्रेट निकोबार ( 642 मी )

** मध्य अंडमान के पूर्व में बैरन द्वीप है जिसपे भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी है।

** उत्तरी अंडमान के पूर्व दिशा स्थित नार्कोंडम द्वीप एक सुषुप्त ज्वालामुखी है।

अंडमान निकोबार द्वीप समूह में चैनेल और स्ट्रेट

6 डिग्री चैनेल – उत्तरी अंडमान को कोको द्वीप से अलग करता है।

10 डिग्री चैनेल – अंडमान को निकोबार द्वीप से अलग करती है।

कोको स्ट्रेट – ग्रेट निकोबार को सुमात्रा से अलग करती है।

जनजातियाँ –

यहाँ जारवा, शाम्पेन, आदि प्रमुख जनजातियाँ है। ये आज भी आदिम स्थिति में रहते है। वर्ष 2014 के 16वी लोकसभा में पहली बार शाम्पेन जनजाति ने मतदान दिया था।

२. लक्षद्वीप –

लक्षद्वीप अरब सागर में स्थित प्रवाल भित्तियों से बना द्वीप समूह है। इसमें द्वीपों की कुल संख्या 36 है। इसमें से केवल 10 द्वीपों पर ही आबादी रहती है। करावत्ती लक्षद्वीप की राजधानी है, जो 9 डिग्री चैनेल के उत्तर में स्थित है।

** 9 डिग्री चैनेल मिनीकाय को इसके बाकी द्वीपों ( मुख्य लक्षद्वीप ) से अलग करता है। मिनीकाय ( अन्द्रोट ) को लक्षद्वीप का सबसे बड़ा द्वीप है।

** 8 डिग्री चैनेल – लक्षद्वीप ( मिनीकाय ) को मालदीव से अलग करता है।

3. पंबन द्वीप – ( मन्नार की खाड़ी )

यह रामसेतु या आदम ब्रिज का ही भाग है। पंबन द्वीप भारत और श्रीलंका के बीच स्थित है। पंबन द्वीप पर हिन्दुओं का पवित्र रामेश्वरम धाम स्थित है।

4. श्रीहरिकोटा द्वीप –

यह आँध्रप्रदेश के तट पर स्थित एक द्वीप है। इसी द्वीप पर भारत का एकमात्र उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र सतीश धवन अन्तरिक्ष केंद्र स्थित है। श्रीहरिकोटा द्वीप पुलीकट लेक को बंगाल की खाड़ी से अलग करता है। पुलीकट झील आँध्रप्रदेश और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित है।

5. न्यू मूर द्वीप –

यह द्वीप बंगाल की खाड़ी में भारत और बांग्लादेश की सीमा पर है। इस पर अधिकार के लिए दोनों देशो में विवाद था। इसलिए इसे दोनों में बाॅट दिया गया भारत वाले हिस्से का अधिकांश भाग समुद्र में डूब गया है।

6. अब्दुल कलाम द्वीप –

अब्दुल कलाम द्वीप को पहले व्हीलर द्वीप के नाम से जाना जाता था। यह उड़ीसा तट से दूर भुवनेश्वर से 150 किमी दूरी पर स्थित है। इस द्वीप का प्रयोग भारत मिसाइल कार्यक्रम के परीक्षण के लिए किया जाता है।

7. माजुली द्वीप

माजुली द्वीप दुनिया का सबसे बड़ा नदीय द्वीप है। यह असम राज्य में ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में स्थित है। यह अपने जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। माजुली को असम का 35 वा जिला बनाया गया है। इसी के साथ यह भारत द्वीपीय जिला बन गया।

भारत के अन्य प्रमुख द्वीप –

a. अलियाबेट – नर्मदा नदी के मुहाने पर अरब सागर में स्थित

b. खलियाबेट – ताप्ती नदी के मुहाने पर स्थित द्वीप

c. वेलिंगटन द्वीप –

वेम्बनाद झील में बनाया गया कृत्रिम द्वीप है। यह कोच्चि शहर का ही भाग है। इसी द्वीप पर भारत का सबसे छोटा रास्ट्रीय राजमार्ग 166 B बनाया गया है।

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उत्तर भारत का विशाल मैदान

प्रायद्वीपीय भारत का पठार

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भारत का भूगोल

उत्तर का विशाल मैदान || सिंधु नदी तंत्र का मैदान || गंगा का मैदान || ब्रह्मपुत्र का मैदान विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन ||उत्तर के विशाल मैदान का विस्तार || उत्तर के मैदान का प्राकृतिक विभाजन || डेल्टा किसे कहते है || खादर क्षेत्र क्या होता है || बांगर की परिभाषा || भाॅबर क्षेत्र किसे कहते है ||

उत्तर का विशाल मैदान –

उत्तर का विशाल मैदान – हिमालय पर्वत के दक्षिण में सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के द्वारा निर्मित विशाल मैदान पाया जाता है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 7 लाख वर्ग किलोमीटर है। पूर्व से पश्चिम में इसकी लंबाई लगभग 3200 किलोमीटर और चौड़ाई 100-150 किलोमीटर है। उच्च गुणवत्ता की मिट्टी के आवरण, पानी की उपलब्धता एवं अनुकूल जलवायु के कारण भारत का अत्यधिक उपजाऊ भाग है। इसीलिए यह सघन जनसंख्या वाला क्षेत्र भी है। उत्तर के विशाल मैदान का विस्तार हिमालय पर्वत और प्रायद्वीपीय भारत के पठार के बीच में है।

उत्तर का विशाल मैदान

1. सिंधु नदी तंत्र का मैदान –

उत्तर के मैदान का पश्चिमी भाग को पंजाब का मैदान कहा जाता है। सिंधु नदी तथा उसकी सहायक नदियों झेलम, चिनाब, रावी, व्यास, सतलज द्वारा मिलकर बनाए गए मैदान का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में है। पांचों नदियों का संगम पंजाब के मिठानकोट नामक स्थान पर होता है। भारत में पंजाब तथा हरियाणा का पश्चिमी भाग इसमें सम्मिलित है। इस इस क्षेत्र में दोआब की संख्या पांच है।

दोआब की परिभाषा –

दो नदियों के बीच बने बहुत ही उपजाऊ छेत्र को दोआब कहा जाता है। सिंधु नदी तंत्र में कुल 5 दोआब स्थित है।

a. सिंधु सागर दोआब – सिंधु और झेलम का दोआब

b. चाझ दोआब झेलम और चुनाव नदियों के बीच

c. रचना दोआब – चिनाब और रावी नदियों के बीच

d. बारी या ऊपरी दोआब – रवि और व्यास के बीच

e. विसत दोआब – व्यास और सतलज का दोआब

इनके अतिरिक्त यहां पर दो और मैदान सिन्धु तन्त्र मे है। जिसमें हरियाणा में भिवानी का मैदान राजस्थान में मालवा का मैदान प्रमुख है।

2. गंगा का मैदान –

यह विशाल यमुना नदी के पूर्व में बांग्लादेश की सीमा तक फैला हुआ है। इसको मध्यवर्ती मैदान या गंगा का मैदान कहा जाता है। मध्यवर्ती मैदान का विस्तार हरियाणा दिल्ली उत्तर प्रदेश झारखंड बिहार और पश्चिम बंगाल तक 1400 किमी है। इस मैदान का निर्माण हिमालय से निकलने वाली गंगा और इसकी सहायक नदियों के नीचे पधारे हुआ है। यह नदियां प्रतिवर्ष हजारों टन मिट्टी का भाग में निक्षेपित कर देते हैं। जिसे खादर और बांगर दो मुख्य मिट्टी कहां पाई जाती है।

गंगा के मैदान के मुख्य फसलें गेहूं चावल दलहनी फसलो तिलहनी फसलें आदि है यह मैदान बहुत ही उपजाऊ है। यहां पे घास के मैदान भी पाए जाते हैं।

गंगा के मैदान को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है।

a. ऊपरी गंगा का मैदान –

यह मैदान दिल्ली से इलाहाबाद तक विस्तृत है। उत्तरी गंगा के मैदान की मुख्य नदियां गंगा, यमुना, रामगंगा, गंडक और घाघरा है। इसे रोहिलखंड का मैदान भी कहा जाता है।

b. मध्य गंगा का मैदान –

इसका विस्तार पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक है। यह मैदान नदियों के प्रवाह मार्ग में परिवर्तन से बुरी तरह प्रभावित है। यह भाग मे बाढ़ का आतंक रहता है। कोसी नदी इसका प्रमुख उदाहरण है।

c. निम्न गंगा का मैदान –

इसका विस्तार हिमालय की तलहटी से लंबाकार गंगा के डेल्टा तक पश्चिम बंगाल राज्य में है। इसके अंतर्गत दार्जिलिंग का उत्तर पर्वतीय क्षेत्र और पश्चिम में पुरूलिया जिला के अतिरिक्त पूरा बंगाल आता है।

3. ब्रह्मपुत्र का मैदान –

इस भाग का विस्तार ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पूरे असम में स्थित है। इसे ब्रह्मपुत्र की घाटी या असम घाटी भी कहा जाता है। यह मैदान तीन ओर से पर्वत और पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इसका निर्माण ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के द्वारा किया गया है। नदियों द्वारा मिट्टी के भारी जमाव से द्वीप भी निर्मित हो गए। असम का माजुली द्वीप दुनिया का सबसे बड़ा नदीय द्वीप है।

विशाल मैदान का विभाजन –

उत्तर के विशाल मैदान को मुख्य रूप से 6 भागो मे विभाजित किया जाता है। भांबर, तराई प्रदेश, काॅप प्रदेश, खादर और बांगर, रेह और डेल्टा है।

1. भाबर क्षेत्र –

शिवालिक पर्वत के गिर उपाधि क्षेत्र में छोटे बड़े पत्थरों के टुकड़ों को नदियों द्वारा इकट्ठा किया जाता है। इसे भाबर क्षेत्र कहते हैं। यह प्रदेश खेती कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं है। यहां नदियां लुप्त हो जाया करती हैं।

2. तराई क्षेत्र –

भांबर क्षेत्र के दक्षिण में मैदान का वह भाग, जिसमे भाबर में गायब हुई नदिया पुनः प्रकट हो जाती है। इस क्षेत्र को तराई क्षेत्र कहा जाता है। यहाँ का अधिकांश भाग दलदल हो जाता है। यहाँ पर वन और अनेक प्रकार के वन्य जीव जन्तु पाए जाते है।

3. काँप प्रदेश –

इस भाग का निर्माण नदियों के द्वारा होता है। इसमें बालू – रेत की कम मात्रा वाली चिकनी मिटटी पाई जाती है। इसको दो भागो में विभाजित किया जाता है।

a. खादर b. बांगर

a. खादर क्षेत्र – नवीन जलोढ प्रदेश

यह नदियों के किनारे का वह है जहा बाढ़ का पानी हर वर्ष पहुचता है। इसे कछारी प्रदेश या बाढ़ का मैदान कहा जाता है। इसका रंग हल्का और बालू कंकण से युक्त होती है।

b. बांगर मिटटी प्रदेश –

उत्तर मैदान का विशालतम भाग पुराणी जलोढ़ मिटटी से बनी है। इस मैदान के अधिक ऊॅचा होने के कारण यहाँ नदियों का बाढ़ का जल हर साल पहुच नहीं पाता है। अतः इसे पुरानी जलोढ़ या पुराणी काँप या बांगर प्रदेश कहा जाता है।

4. रेह क्षेत्र –

बांगर मिटटी के क्षेत्रो में जिन स्थानों पर सिचाई या जल भराव अधिक होता है। वहा पर कही – कहीं नमकीन परत या सफ़ेद परत बन जाती है। इस मिटटी को रेह या कल्हर कहा जाता है। यह मिटटी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब के शुष्क भागो में पाई जाती है।

5. डेल्टा-

नदियां लाये गए मलवे को समुद्र में अपने मुहानों पर निक्षेपित करती है, जिससे डेल्टा का निर्माण होता है। गंगा और ब्रह्मपुत्र का डेल्टा सुंदरवन का डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है।

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सिन्धु घाटी सभ्यता में कृषि और पशुपालन

विद्युत् रासायनिक श्रेणी किसे कहते है

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विद्युत रासायनिक श्रेणी किसे कहते हैं || विद्युत सक्रियता श्रेणी किसे कहते है || विद्युत रासायनिक श्रेणी से आप क्या समझते हैं || विद्युत रासायनिक श्रेणी के महत्व || विद्युत रासायनिक श्रेणी की विशेषताएं || विद्युत रासायनिक श्रेणी किसे कहते हैं और इसके प्रमुख लक्षण लिखिए ||विद्युत रासायनिक श्रेणी के मुख्य उपयोग बताइये ||

विद्युत रासायनिक श्रेणी किसे कहते हैं – ( Electrochemical Series )

विद्युत रासायनिक श्रेणी किसे कहते हैं – विभिन्न इलेक्ट्रोडो को इनके मानक इलेक्ट्रोड विभव अर्थात मानक अपचयन विभव के बढते क्रम मे लिखने पर जो श्रेणी प्राप्त होती है, उसे विद्युत रासायनिक श्रेणी या सक्रियता श्रेणी कहते हैं। इस श्रेणी मे सभी धातुएं घटते हुए सक्रियता क्रम मे व्यवस्थित है।

* विद्युत रासायनिक श्रेणी मे इलेक्ट्रोडो के मानक इलेक्ट्रोड विभवों के घटते या बढ़ते किसी भी क्रम मे रख सकते है। *

electro chemical series

* मानक इलेक्ट्रोड विभव = मानक अपचयन विभव

* मानक ऑक्सीकरण विभव = – मानक इलेक्ट्रोड विभव

* मानक ऑक्सीकरण विभव = – मानक अपचयन विभव

विद्युत रासायनिक श्रेणी के मुख्य उपयोग –

विद्युत रासायनिक श्रेणी के प्रमुख लक्षण या उपयोग निम्नवत है।

1. इस विद्युत रासायनिक श्रेणी के द्वारा धातुओ की क्रियाशीलता की तुलना की जा सकती है। विद्युत रासायनिक श्रेणी मे जिन धातुएं का स्थान ऊपर की ओर है उनका –

a. उन धातुओं के इलेक्ट्रोड विभव कम होते है,

b. अर्थात् उनके अपचयन विभव का मान कम होते है,

c. अर्थात् उन धातुओं के ऑक्सीकरण विभव अधिक होते है,

d. मतलब उन धातुओं की आक्सीकृत होने की क्षमता भी अधिक होती है

e. इन धातुओं की इलेक्ट्रॉन त्याग कर धनायन बनाने की प्रवृत्ति भी अधिक होती है

f. इन धातुओं में अधिक क्रियाशील होती हैं।

” धातुओं की क्रियाशीलता या सक्रियता उनके इलेक्ट्रोड विभव के बढ़ते क्रम में घटती है। इस प्रकार, विद्युत रासायनिक श्रेणी में धातुओं को उनकी क्रियाशीलता के घटते क्रम में व्यस्थित किया गया है।”

K > Na > Mg > Al > Zn > Fe > Cu > Ag

किसी अधिक क्रियाशील धातु को कम क्रियाशील धातु के विलयन में डालने पर कम क्रियाशील धातु मुक्त हो जाती है।

Fe + CuSO4 —-> FeSO4 + Cu

आयरन रासायनिक श्रेणी में कॉपर से ऊपर स्थित है, और से अधिक क्रियाशील है। अतःFe को CuSO4 के विलयने मिलाने पर Cu को अलग कर देती है।

2. इस श्रेणी से धातुओं के द्वारा अम्लों मे से हाइड्रोजन को विस्थापित करने की क्षमता की जानकारी मिलती है।

विद्युत रासायनिक श्रेणी में जो धातु में हाइड्रोजन से ऊपर स्थित होते हैं उनमें ऑक्सीकरण होने की प्रवृत्ति अधिक होती है। अर्थात् उनमें धनायन बनाने की प्रवृत्ति अधिक होती है। इसलिए यह धातुए अम्लों से उनके हाइड्रोजन को विस्थापित कर देती हैं।

2Al + 6HCl —–> 2AlCl3 +3H2

3. विद्युत् रासायनिक श्रेणी के द्वारा सभी आक्सिकारको की आक्सीकरण क्षमता की तुलना किया जा सकता है। तथा अपचायको की भी अपचायक क्षमताओं की तुलना कर सकते है।

4. इस श्रेणी की मद्द से किसी भी गैल्वेनिक सेल या वोल्टीय सेल के EMF की गणना कर सकते है।

** विद्युत रासायनिक श्रेणी किसे कहते हैं **

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भारत का भूगोल

प्रायद्वीपीय भारत का पठार || प्रायद्वीपीय पठार का मानचित्र || प्रदीपीय पठार की विशेषताएं || प्रदीपीय पठार इन इंग्लिश || दक्कन का पठार || छोटा नागपुर का पठार || मालवा का पठार || मेघालय का पठार || धारवाड़ का पठार ||

प्रायद्वीपीय भारत का पठार -

प्रायद्वीपीय भारत का पठार एक अनियमित आकार की त्रिभुजाकार आकृति वाला एक बड़ा भूखंड है। इसका विस्तार उत्तर पश्चिम में अरावली पर्वतमाला तथा दिल्ली पूर्व में राजमहल की पहाड़ियों तक है। पश्चिम में गिर पहाड़ियों और दक्षिण में इलायची की पहाड़ी तथा उत्तर पूर्व में शिलांग के पठार तक है। प्रायद्वीपीय पठार की औसत ऊंचाई 600 से 900 मीटर है। 

भारत के प्रायद्वीपीय पठार का निर्माण कैसे हुआ है ? 

इसका निर्माण गोंडवाना लैंड अटूट कर उत्तर दिशा में प्रवाहित होने के फलस्वरूप हुआ है। यह पृथ्वी के प्राचीनतम भूभाग पैंजिया का हिस्सा है। यह बहुत पुरानी क्रिस्टलीय, आग्नेय और कायांतरित चट्टानों से मिलकर बना है। जब भारतीय प्लेट अरबसागरीय  प्लेट से टकराई थी तो यहां पर तीव्र भूकंप एवं ज्वालामुखी विस्फोट हुआ। विस्फोट से निकला मैग्मा पूरे प्रायदीप पर फैल गया। पश्चिम भाग मे अधिक मैग्मा जमा हो गया जिससे यह ऊंचा है और पूर्वी भाग नीचे है। 

प्रायद्वीपीय भारत का पठार का ढाल - 

प्रदीप भाग का ढाल उत्तर से पूर्व की ओर है। जो हमें सोन, चंबल,दामोदर नदियों के प्रवाह द्वारा देखने को मिलता है। दक्षिणी भाग में इसका डाल पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर है। यह कृष्णा, महानदी, कावेरी और गोदावरी नदियों के प्रवाह से देखा जा सकता है। भ्रंश घाटी में बहने के कारण नर्मदा एवं ताप्ती नदियां पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।

प्रायद्वीपीय भारत का पठार को पठारो का पठार कहा जाता है क्यों ?

 भारत के प्रायदीपीय पठार अनेक पठारों से मिलकर बना है इसके मुख्य पठार नीचे दिए गए हैं- 

1. मध्यवर्ती उच्च भूमि

2. दक्कन ट्रैप

3. धारवाड़ का पठार

4. रायसीना का पठार

5. विदर्भ का पठार नागपुर का पठार

6. बस्तर का पठार

7. छोटा नागपुर का पठार

8. मेघालय का पठार 

1. मध्यवर्ती उच्च भूमि Central Upland - 

नर्मदा नदी के उत्तर और उत्तर के विशाल मैदान के बीच के भाग को मध्यवर्ती उच्च भूमि कहते हैं। इसका विस्तार गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ के कुछ भागो तक है। इसके अंतर्गत निम्न मुख्य भाग हैं -

a. अरावली पर्वत

b. मालवा का पठार

c. बुंदेल का पठार

d. मेवाड़ का पठार

e. विंध्य पर्वत

f. सतपुड़ा पर्वत श्रेणी

g. बघेलखंड का पठार

2. पूर्वी पठार -

पूर्वी पठार का विस्तार दक्षिणी बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के कुछ भागों तक है। पूर्व के पठार के मुख्य भाग निम्नलिखित है -

a. छोटा नागपुर का पठार

b. छत्तीसगढ़ बेसिन महानदी बेसिन

c. दंडकारण्य का पठार

यह पूर्व का पठारी भाग भारत में कोयला एवं धातु खनिज उत्पादन की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां की मुख्य नदियां दामोदर, स्वर्णरेखा नदी, महानदी और इंद्रावती नदी है।

3. उत्तर - पूर्वी पठार

संरचना के दृष्टि से उत्तर पूर्वी पठार  छोटा नागपुर पठार का हिस्सा है। यह राजमहल - गारो गैप या मालदा गैप के द्वारा अलग होता है। इसका विस्तार मुख्य रूप मे मेघालय और असम के कुछ हिस्सों में है।

इसके मुख्य भाग हैं -

a. मेघालय का पठार

b. असम का पठार

मेघालय के पठार में गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों के कारण अधिक वर्षा होती है। यहीं पर मासिनराम और चेरापूंजी में विश्व की सर्वाधिक वर्षा होती है। औसत से अधिक वर्षा होने की वजह से यहां लैटेराइट मिट्टी और सदाबहार वन पाए जाते हैं।

4. दक्कन का पठार

इस पठार का विस्तार ताप्ती नदी के दक्षिण में त्रिभुजाकार रूप में है। इसके अंतर्गत मुख्य पठार नीचे लिखे गए हैं -

a. दक्कन ट्रैप

b. धारवाड़ का पठार

c. आंध्र का पठार

d. नागपुर का पठार

इस भाग में गोदावरी कृष्णा कावेरी आदि प्रमुख नदियों का प्रवाह होता है। बेसाल्ट चट्टानों के कारण यहां काली मिट्टी का विकास हुआ है। जिसके कारण यह कपास के लिए बहुत ही उपजाऊ है।

अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें- भारतीय पुरापाषाण कालीन स्थल और वहांं से प्राप्त अवशेष भारत के प्रमुख बंदरगाह
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History { इतिहास }

विश्व के प्रमुख घास के मैदान || प्रेयरीज घास का मैदान कहा पाया जाता है || वेल्ड घास का मैदान || कैंटरबरी घास का मैदान कहा पाया जाता है || डाउंस घास का मैदान ||उष्ण कटिबंधीय घास के मैदान को क्या कहते हैं || वेनेजुएला के घास के मैदान को क्या कहते है ||

विश्व के प्रमुख घास के मैदान –

विश्व के प्रमुख घास के मैदान

विश्व के प्रमुख घास के मैदान – विश्व के विभिन्न हिस्सों मे अनेक प्रकार के घास के मैदान पाये जाता है। घास एक बहुत व्यापक अर्थ वाला शब्द है। घास मे मुख्य रूप से ऐसी वनस्पतियां आती है जो बकरी, गाय, भैस, भेड, पशु चारे मे खाते है। अंटार्कटिका को छोडकर बाकी सारे महाद्वीपों मे घास के मैदान पाये जाते है। हाथी घास, दूब, आदि के अलावा धान, गेहूॅ, बाजरा, बाॅस, आदि घास है। उदाहरण – प्रेयरीज, पम्पास, पुस्टाज, पटाना आदि।

शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान –

उत्तरी गोलार्द्ध मे कर्क रेखा से आर्कटिक वृत्त ( 66.5° अक्षांश ) और दक्षिणी गोलार्ध मे मकर रेखा से अंटार्कटिक वृत्त के बीच शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान पाये जाते है। इन घास के मैदान बहुत उपजाऊ होते है। इन क्षेत्रो मे मौसम ठंडा रहता है और वर्षा सामान्य होती है। इनमे रवि की फसल गेहूं, चना, जौ आदि मुख्य फसले है।

उष्णकटिबंधीय घास के मैदान –

ऊष्ठ कटिबंधीय घास के मैदान कर्क रेखा ( 23.5° उत्तर अक्षांश ) से मकर रेखा ( 23.5° दक्षिणी अक्षांश ) के बीच फैले होते हैं। इस इस भाग में सूर्य हमेशा चमकता रहता है या मौसम काफी गर्म रहता है। यहां बारिश बहुत अधिक होती है। यहां छोटे पेड़ पौधे से लेकर बहुत बड़े-बड़े पेड़ भी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।

शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान –

इसके मुख्य उदाहरण नीचे लिखे गए हैं,

1. प्रेयरीज –

उत्तरी अमेरिका के कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका में फैले घास के मैदान प्रेयरी घास के मैदान कहलाते हैं। यह रॉकी और अप्लेशियन पर्वत के मध्य पाए जाते है। इन घास के मैदानों में चिनूक हवा चलती है। यह मैदान गेहूं के खेती के लिए बहुत उपजाऊ होता है।

2. पम्पास –

दक्षिणी अमेरिका के उरुग्वे और अर्जेंटीना में फैले शीतोष्ण घास के मैदान पंपास कहलाते हैं। यह बहुत उपजाऊ होते हैं।

3. स्टेपीज –

यूरेशिया में यूक्रेन और रूस के मध्य फैला शीतोष्ण घास के मैदान स्टेपी घास के मैदान कहलाता है। यहा छोटे पौधे और झाड़ियां अधिक पाए जाते हैं। जबकि यहां बड़े वृक्षों की संख्या बहुत कम है।

4. पुस्टाज –

पुस्टाज घास के मैदान हंगरी में पाए जाते हैं और उपजाऊ होते हैं। एक प्रकार का शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदान है।

5. वेल्ड –

वेल्ड घास के मैदान अफ्रीका के जिम्बाम्बे , नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका मे पाये जाते है। यह उपजाऊ मैदान है।

6. डाउंस –

ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी भाग में पाए जाने वाले शीतोष्ण कटिबंधीय के घास के मैदान है।

7. कैंटरबरी –

कैंटरबरी न्यूजीलैंड के मैदानों में पाई जाने वाली शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदान है। यहाॅ छोटे पौधे पाये जाते है। यह मैदान बहुत उपजाऊ होते हैं।

ऊष्णकटिबंधीय घास के मैदान –

ऊष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान निम्नवत है।

8. लानोज –

लानोज घास के मैदान दक्षिण अमेरिका के उत्तरी भाग वेनेजुएला मे पाये जाते है। यह उष्णकटिबन्धीय घास का मैदान है।

9. सेल्वास –

अमेजन बेसिन में पाए जाने वाले उष्णकटिबंधीय घास के मैदान सेल्वास कहलाते है।

10. कंपास –

कंपास ब्राजील के मैदानों में पाई जाने वाले उष्णकटिबंधीय घास के मैदान है।

11. सवाना –

सवाना उष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान है। यह अफ्रीका महाद्वीप के पूरे सहारा मरूस्थल, पूर्वी अफ्रीका के केन्या, तंजानिया मे पायी जाती है।

12. पटाना –

पटाना घास के मैदान श्रीलंका में पाए जाते है। यह एक उष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान है।

13. पार्कलैंड –

ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी भाग में उष्णकटिबंधीय घास के मैदान पाए जाते हैं। जिन्हें पार्कलैंड घास के मैदान कहा जाता है।

* विश्व के प्रमुख घास के मैदान *

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कार्बन फोर्टीन काल निर्धारण विधि

कांस्य युग का इतिहास

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श्वासोच्छ्वास की परिभाषा || श्वासोच्छ्वास की क्रिया विधि|| निश्वसन किसे कहते हैं|| निःश्वसन क्या होता है ||मनुष्य में ऑक्सीजन परिवहन कैसे होता है|| मानव में कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कैसे होता है|| Breathing in hindi pdf || Mechanism of Breathing in hindi || ऑक्सी हिमोग्लोबिन क्या है ||

श्वासोच्छ्वास की परिभाषा –

श्वासोच्छ्वास की परिभाषा – वायुमंडल से शुद्ध वायु का हमारे फेफड़ों तक पहुंचना और अशुद्ध वायु का फेफड़ों से बाहर निकलने की क्रिया को श्वासोच्छ्वास कहा जाता है। श्वासोच्छ्वास क्रिया में बाह्य वायुमंडल और हमारे फेफड़ों के बीच गैसों का लेन देन होता है।

यह श्वासोच्छ्वास की क्रिया कोशिकाओं के बाहर होती है। यह एक भौतिक क्रिया है। इस क्रिया मे आक्सीजन वाली स्वच्छ वायु ली जाती है। और कार्बन डाई आक्साइड शरीर से बाहर निकाल दी जाती है। इस क्रिया मे एन्जाइम की आवश्यक्ता नही होती है। इसमे ऊर्जा उत्पन्न नही होती है।

श्वासोच्छ्वास की क्रिया विधि – ( Mechanism of Breathing )

यह क्रिया दो भागों में पूरी होती है।

1. निश्वसन

2. निःश्वसन

1. निश्वसन किसे कहते है – ( Inspiration ) –

इस क्रिया में वातावरण से शुद्ध हवा फेफड़ों में पहुंचती है। मानव में सांस लेते समय डायाफ्राम नीचे की ओर खिसक जाता है और पसलियां ऊपर की तरफ खिसकती हैं। इससे वक्ष का आयतन बढ़ जाता है, तथा फेफड़े में वायु का दाब कम हो जाता है। इस वायु के कम दबाव को पूरा करने के लिए शुद्ध वायु नासिका से श्वास नली द्वारा फेफड़ों में भर जाती है। फेफड़ों के वायु कोष में भरी हवा की ऑक्सीजन रुधिर कोशिकाओं के संपर्क में आती है। और विसरण क्रिया द्वारा रक्त में मिल जाते हैं। इसी प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड CO2 रक्त से विसरण द्वारा वायु कोषो में आ जाती है। यह पूरी क्रिया निश्वसन कहलाती है।

2. निःश्वसन क्या होता है – ( Expiration )

इस क्रिया मे कार्बन डाई आक्साइड CO2 युक्त हवा फेफडो से बाहर निकलती है। इसमे पसलियाॅ और डायाफ्राम अपनी सामान्य स्थिति मे आ जाते है। वक्ष गुहा का आयतन भी फिर से कम हो जाता है। इसके कारण फेफड़ो पर दबाव बढ जाता है, और कार्बन डाइऑक्साइड गैस हवा में मिलकर शरीर से बाहर निकल जाती है। यह क्रिया निःश्वसन कहलाती है।

3. गैसीय विनिमय – ( Gases Exchange )

फेफड़ो मे गैसो का आदान – प्रदान एक सामान्य विसरण क्रिया द्वारा होता है। वायु कूपिकाओं से ऑक्सीजन O2 रक्त कोशिकाओ मे विसरण द्वारा पहुच जाता है। इसी प्रकार, रक्त कोशिकाओं से कार्बन डाई ऑक्साइड CO2 वायु कोषो मे विसरित हो जाती है।

4. शरीर में ऑक्सीजन का परिवहन ( Oxygen Transport ) –

जीव जंतुओं में ऑक्सीजन खून में पाई जाने वाली हीमोग्लोबिन से क्रिया करके ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है। कोशिकाओं में पहुंचकर ऑक्सीहिमोग्लोबिन विघटित होकर O2 को अलग कर देता है। और हीमोग्लोबिन मुक्त होकर पुनः ऑक्सीजन से संयोग करने के लिए तैयार हो जाता है।

हिमोग्लोबिन क्या होता है – Hemoglobin

हिमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक लौह प्रोटीन होता है। हिमोग्लोबिन का कार्य ऑक्सीजन को फेफड़े से अंगो की कोशिकाओं तक पहुंचाना और कोशिकाओं से कार्बन डाइऑक्साइ को फेफड़े तक वापस लाना है। हीमोग्लोबिन की कमी का तात्पर्य लाल रक्त कणिकाओं की कमी होती हैं, जिसे एनीमिया कहते है। विटामिन B12 और आयरन की कमी से एनीमिया रोग होता है।

ऑक्सीहीमोग्लोबिन क्या होता है – Oxyhemoglobin 

फेफड़ों में ऑक्सीजन लाल रक्त कणिकाओं की हिमोग्लोबिन से क्रिया करके ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है। शरीर के ऊतकों या अंगों मे पहुंच कर ऑक्सी – हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन O2 को मुक्त कर देता है।

श्वासोच्छ्वास मे वायु का संघटन – ( Composition of Air in Breathing )

1. अन्दर ली गयी वायु मे – नाइट्रोजन 79%, ऑक्सीजन 21%, कार्बन डाइऑक्साइड 0.03%,जलवाष्प 0.25%

2. बाहर निकाली गई वायु में – नाइट्रोजन 79% ,ऑक्सीजन 17%, कार्बन डाइऑक्साइड 4%, जलवाष्प 6.5%

3. वायु कोष्ठकों में – नाइट्रोजन 79%, ऑक्सीजन %, कार्बन डाइऑक्साइड % , जलवाष्प %

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श्वसन की परिभाषा और अभिक्रिया लिखिए

प्रकाश संश्लेषण क्रिया की परिभाषा बताइए

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इलेक्ट्रोड विभव क्या होता है || विभव की परिभाषा || इलेक्ट्रोड की परिभाषा || इलेक्ट्रोड विभव की परिभाषा || अपचयन विभव की परिभाषा || ऑक्सीकरण विभव क्या होता है || ऑक्सीकरण विभव और अपचयन विभव में संबंध || मानक इलेक्ट्रोड किसे कहते हैं || इलेक्ट्रोड विभव मापने की विधि ||

इलेक्ट्रोड विभव क्या होता है –

इलेक्ट्रोड विभव क्या होता है

* जब किसी धातु की छड़ो उस धातु के किसी लवण के जलीय विलियन में डुबो दिया जाता है। तब उस धातु की छड़ पर ऑक्सीकरण या अपचयन अर्ध अभिक्रिया होती है।

उदाहरण के लिए –

1. जिंक की छड़ को जिंक के धनायन के घोल में डुबाये जाने पर निम्न अभिक्रिया होती है-

Zn++ + 2e- Zn

2. इसी प्रकार कॉपर के लिए,

Cu++ + 2e- Cu

इस प्रकार , जब किसी धातु की छड़ को उसी के लवण के जलीय विलयन में डुबोया जाता है। तो धातु की इस छड़ को इलेक्ट्रोड ( Electrode) कहते हैं। इस पूरे उपकरण को अर्द्ध सेल ( Half Cell )कहा जाता है।

विभव की परिभाषा ( Definition of Potential ) –

किसी वस्तु या पिण्ड का विघुतीय विभव कार्य की वह मात्रा है, जो इकाई धन आवेश को अनन्त दूरी से उस वस्तु या पिण्ड तक लाने मे करना पड़ता है।

* इस वजह से धन आवेशित वस्तु का विभव धनात्मक और ऋण आवेशित वस्तुओं का विभव ऋणात्मक होता है। किसी भी विद्युत उदासीन वस्तु का विभव शून्य होता है।

* विद्युत ( Current ) हमेशा अधिक विभव वाली वस्तुओं से कम विभव वाली वस्तु की ओर चलती है। विद्युत या करंट के प्रवाह की दिशा, इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह की दिशा के विपरीत होती है।

इलेक्ट्रोड विभव की परिभाषा – ( Electrode Potential )

जब किसी धातु की छड़ को उसके किसी लवण में डुबोया जाता है। तो उस धातु की छड़ पर विभव उत्पन्न होता है। इस विभव को उस इलेक्ट्रोड या उस सेल पर होने वाली अर्द्ध अभिक्रिया का इलेक्ट्रोड विभव कहा जाता है।

इसे भी पढ़ें – अनुवांशिकता की परिभाषा और इसकी खोज किसने किया

मानक इलेक्ट्रोड क्या होता है –

किसी धातु के इलेक्ट्रोड का विभव उस धातु की प्रकृति, विलयन की सान्द्रता और तापमान पर निर्भर करती है। इसलिए विभिन्न धातुओ के इलेक्ट्रोड की तुलना के लिए उनके मानक इलेक्ट्रोडों का प्रयोग करते है।

किसी शुद्ध धातु की छड़ को उसके किसी लवण के एक 1 मोलर सांद्रता वाले विलयन में 25 °C पर डुबाया जाता है। तो विलयन में डूबी छड़ को मानक इलेक्ट्रोड कहते हैं।

ऑक्सीकरण विभव क्या होता है –

जब कोई इलेक्ट्रोड विलयन में इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति रखता है, तो उसके विभव को ऑक्सीकरण विभव कहते हैं।

अपचयन विभव किसे कहते है –

जब कोई इलेक्ट्रोड विलियन से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखता है तो इसके विभव को अपचयन विभव कहते हैं।

* ऑक्सीकरण विभव और अपचयन विभव आपस में बराबर होते हैं सिर्फ इनका चिन्ह अलग होता है। ऑक्सीकरण विभव का मान ऋणात्मक और अपचयन विभव धनात्मक होता है। *

* मानक अपचयन विभव = मानक इलेक्ट्रोड विभव

* मानक ऑक्सीकरण विभव = – मानक इलेक्ट्रोड विभव

* मानक ऑक्सीकरण विभव = – मानक अपचयन विभव

इसे भी पढ़ें – विटामिन की परिभाषा प्रकार और उनके कार्य

इलेक्ट्रोड विभव मापने की विधि –

किसी एक इलेक्ट्रोड का विद्युत विभव प्रयोग द्वारा ज्ञात कर पाना संभव नहीं होता है। किसी दो इलेक्ट्रोडों के विभवो का अंतर हम प्रयोग द्वारा ज्ञात कर स

कते हैं। किसी एक इलेक्ट्रोड का विभव शून्य मानकर बाकी इलेक्ट्रोड्स का विभव ज्ञात कर सकते हैं। इसके लिए मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड का विभव शून्य मान लेते हैं। इसी के आधार पर अन्य मानक इलेक्ट्रोडो का विभव निकाला जाता हैं।

कुछ प्रमुख इलेक्ट्रोडों के इलेक्ट्रोड विभव –

जिंक का इलेक्ट्रोड विभव = – 0.76

काॅपर का इलेक्ट्रोड विभव = + 0.34

सिल्वर का इलेक्ट्रोड विभव = + 0.80

विभिन्न इलेक्ट्रोडो को उनकी मानक इलेक्ट्रोड विभव के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करके एक श्रेणी बनाई जाती है। इस श्रेणी को विद्युत रासायनिक श्रेणी कहा जाता है।

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मिश्र धातु की परिभाषा || मिश्र धातु किसे कहते हैं || मिश्र धातु in English || मिश्र धातु क्या है इसके दो उपयोग || सोल्डर किसका मिश्र धातु है || मिश्र धातु पर टिप्पणी || मिश्र धातु के दो उदाहरण दीजिए || मिश्र धातु ट्रिक|| मिश्र धातु के संगठन|| मिश्र धातु pdf download ||

 

मिश्र धातु की परिभाषा – ( Alloys )

मिश्र धातु की परिभाषा – यदि दो या दो से अधिक धातुओं को पिघलाकर आपस में मिलाया जाए तो एक समांगी मिश्रण प्राप्त होता है। यह मिश्रण ठण्डा होकर ठोस मिश्रण बन जाता है। इस प्रकार दो या दो से अधिक धातुओ को मिलाकर बने समांगी मिश्रण को मिश्र धातु कहा जाता है।मिश्र धातु की परिभाषा  मिश्र धातु

मिश्र धातुओं के गुण उनके आवयवी तत्वों से प्रायः अलग होते हैं। जैसे इस्पात ( Steel) अपने मुख्य अवयव लोहे की अपेक्षा अधिक मजबूत होती है।
मिश्र धातुओं के कुछ मुख्य उदाहरण – निम्नलिखित है –  पीपल,  जर्मन सिल्वर, स्टेनलेस  स्टील, टाका (Solder) आदि।

 

1 पीतल -( Brass )

पीतल ताॅबे (80%) और जिंक (20%) का मिश्रण होता है। इसका उपयोग बर्तन तथा तार बनाने मे, मशीनो मे, कारतूसो मे किया जाता है।

2. कांसा या कांस्य (Bronze)

काॅपर (88%) और टिन (12%) का मिश्रण है। इसका उपयोग बर्तन और मूर्तिया बनाने मे किया जाता है। कांसे  का इस्तेमाल ताम्र युग के तुरंत बाद मिलता है। मानव सभ्यता के विकास में कांस्य युग का महत्वपूर्ण योगदान है।

 

3. जर्मन सिल्वर( German Silver )

जर्मन सिल्वर कॉपर (60%), जिंक (20%) और निकिल (20%) का एक मिश्रण होता है। german silver (जर्मन सिल्वर) का उपयोग जेवर, बर्तन और मूर्तियां बनाने में किया जाता है।

4 स्टेनलेस स्टील (stainless-steel)

वर्तमान युग में stainless-steel एक वरदान की तरह है। स्टेनलेस स्टील मुख्य रूप से लोहा, क्रोमियम, निकिल और कार्बन का मिश्रण होता है। इसका उपयोग बर्तन, मूर्तियां, साइकिलो के कलपुर्जे, वाहनों में, शल्य चिकित्सा के औजार बनाने, आदि मे किया जाता है। लोहे के साथ कार्बन सबसे सस्ता मिश्रक होता है। आवश्यकता के अनुसार लोहे में वैनेडियम, मैगनीज, क्रोमियम और टंगस्टन मिलाया जाता है। लोहे में मिश्रण मिलाकर उसकी कठोरता, तन्यता, सुघट्यता में परिवर्तन किया जाता है।

5 टाँका (Solder)-

टाॅका (सोल्डर) लेड और टिन का एक मिश्रण होता है। इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सोल्डरिंग करने में किया जाता है। टाँका एक गलनीय मिश्रधातु है।

6. अमलगम –

पारा एक प्रकार की धातु है और सामान्य ताप पर द्रव अवस्था में पाया जाता है। अनेक धातुएं पारे में घुलनशील होती हैं। इस प्रकार धातुओं का पारे के साथ बने विलयन या मिश्रधातु को संलय (अमलगम) कहा जाता है। लोहे को छोड़कर लगभग सभी धातुएं पारे के साथ मिश्र धातु बनाते हैं। संरस में मिलाई गई पारे की मात्रा के अनुसार मिश्र धातु ठोस या द्रव अवस्था में होती है।

संलय के उपयोग – (different uses of amalgam)

1. दंत संलय Dental Amalgam चांदी तांबा और राॅगे के साथ बने संरस का उपयोग दातों के कोटरों को भरने में किया जाता है।
2. अल्मुनियम संलय अपचायक के रूप में प्रयुक्त होता है।
3. सोडियम संलय अपचायक
4. स्वर्ण संलय
5. थैलियम संलय

मिश्र धातु की परिभाषा से परीक्षा में आने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न –

1. कांस्य किन धातुओं के मिश्र धातु है –
Ans. काॅपर और टिन

2. सोल्डर किसका मिश्रण है –
Ans. लेड और टिन

3. पीतल किसका मिश्रधातु है –
Ans. ताॅबे और जिंक

4. अमलगम किसकी मिश्रधातु है –
Ans. पारे की मिश्रधातु

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आरहीनियस का वैद्युत वियोजन का सिद्धान्त

रासायनिक अभिक्रिया की परिभाषा उदाहरण

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धातु और अधातु के रासायनिक गुण || धातु और अधातु की परिभाषा || धातु और अधातु मे अन्तर || धातु और अधातु कक्षा 10 || अधातु किसे कहते हैं || धातु और अधातु में रासायनिक अंतर || धातु और अधातु के उपयोग || धातु और अधातु के भौतिक गुण || Metals and Non Metals in hindi || धातु और अधातु के रासायनिक गुण pdf download ||

धातु और अधातु के रासायनिक गुण –

धातु और अधातु के रासायनिक गुण – धरती पर उपस्थित सभी तत्वो को इनके गुणधर्मो के आधार पर मुख्य रूप से दो भागो मे विभक्त किया गया है।

1. धातु (Metal)

2. अधातु (Non-metal)

3.उपधातु (Metalloids)

 

धातु की परिभाषा –

ऐसे तत्व धातु कहलाते है जो –

1. धातुऐ विद्युत और उष्मा की सुचालक होते हैं।

2. धातुओं को तार के रूप में खींचा जा सकता है, इस गुण को धातु तन्यता कहते हैं।

3. इनको हथौड़े से पीटने पर यह टूटते नहीं हैं, बल्कि इनके पृष्ठ के क्षेत्रफल में वृद्धि होती है। इस गुण को आघातवर्धनीयता कहते हैं।

4. धातुओं में विशेष प्रकार के चमक होती है जिसे धात्विक चमक कहा जाता है।

5. धातुओं में धनायन बनाने की प्रवृत्ति होती है।

Na ——> Na+ + e-

धातुओ के उदाहरण – कॉपर, आयरन, मरकरी, सोना, चांदी, सोडियम आदि।

हाइड्रोजन ऐसा तत्व है, जिसमे धनायन और ऋणायन दोनो बनाने की प्रवृत्ति होती है। इसमें धातुओं के अन्य गुण भी नहीं होते है। अतः हाइड्रोजन धातु नहीं होता है

अधातु की परिभाषा –

ऐसे तत्व कहलाते हैं जो –

1. जो सामान्य रूप से विद्युत और उष्मा के कुचालक होते हैं।

2. यह तन्य नहीं होते हैं।

3. ये अघातवर्धनी नहीं होते, बल्कि यह भंगुर होते हैं। इसका मतलब यह हथोड़े से कितनी बार छोटे-छोटे भागों में टूट जाते हैं।

4. अधातु में कोई विशेष चमक नहीं होती है।

5. अधातु सामान्य रूप से ऋण आयन बनाने की प्रवृति रहते हैं।

अधातु के उदाहरण – सल्फर, ब्रोमीन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, कार्बन, क्लोरीन आदि।


 


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उप-धातु की परिभाषा –

कुछ ऐसे तत्व जिनमे धातु और अधातु दोनों के गुण उपस्थित होते हैं, उपधातु कहलाते हैं।

उपधातु के उदाहरण- आर्सेनिक और एंटीमनी उपधातु है। इनके आक्साइड उभयधर्मी होते हैं।

धातु और अधातु के रासायनिक गुण में अंतर –

धातुओ और अधातुओ के भौतिक और रासायनिक गुणो मे अनेक प्रकार के अन्तर पाये जाते है। जिन्हे नीचे दिया गया है।
1. भौतिक अवस्था –

अधिकांश ठोस अवस्था में पाए जाते हैं, जबकि अधातु तीनों अवस्था में मिलते हैं।

2. पारदर्शिता – धातु अपारदर्शी होते हैं, जबकि पारदर्शी अपारदर्शी और पारभाषक हो सकता है।

3. तन्यता – धातु तन्य होते हैं जबकि अधातु में तन्यता का गुण नहीं पाया जाता है।

4. आघातवर्धनीयता – धातुओं को हथौड़े से पीटने पर उनके पृष्ठ के क्षेत्रफल में वृद्धि होती है। जबकि अधातु आघातवर्धनीय नहीं होते हैं।

5. भंगुरता – धातुएं भंगुर नहीं होती है, जबकि अधातु को पीटने से छोटे – छोटे टुकड़ो में टूट जाते हैं।

6. वैद्युत अपघटन विद्युत- अपघटन के उपरांत धातु कैथोड पर एकत्रित होते हैं, जबकि अधातुए एनोड पर एकत्र होते हैं।

7. ऑक्साइडो की प्रकृति – धातुओं के ऑक्साइड छारीय होते हैं, जबकि अधातु के आक्साइड अम्लीय होते हैं।

8. धातुओं में धनायन बनाने की प्रवृत्ति होती है अतः यह धन विद्युतीय तत्व कहलाती है। अधातुओं में ऋणायन बनाने का गुण होता है इसलिए यह ऋण विद्युतीय तत्व कहलाते हैं।

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तत्वों का आवर्ती गुण

आर्हीनियस का विद्युत वियोजन सिद्धांत

रासायनिक अभिक्रिया के प्रकार और परिभाषा

रेडियो कार्बन फोर्टीन काल निर्धारण विधि


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वैद्युत-वियोजन का सिद्धांत || आरहीनियस का आयनिक सिद्धांत हिंदी में || आयनीकरण की अर्हनीस सिद्धांत || वियोजन किसे कहते हैं || वियोजन की मात्रा || वियोजन अभिक्रिया कितने प्रकार की होती है || वियोजन अभिक्रिया किसे कहते है उदाहरण सहित || वियोजन अभिक्रिया क्या है उदाहरण दीजिए || उष्मीय वियोजन किसे कहत है || Theory of Electrolytic Dissociation || वैद्युत-वियोजन का सिद्धांत pdf ||

वैद्युत-वियोजन का सिद्धांत –

वैद्युत-वियोजन का सिद्धांत – 1887 ई मे आरहीनियस ने वैद्युत अपघटन की क्रिया और विद्युत अपघट्य के गुण को स्पष्ट करने के लिए सिद्धांत प्रतिपादित किया था। इसे वैद्युत वियोजन का सिद्धांत या आयनिक सिद्धांत कहा जाता है।

1. किसी वैघुत अपघट्य को जल या विलायक मे घोलते है तो वह दो प्रकार के विद्युत आवेशित कणो मे विभाजित हो जाता है। यह क्रिया आयनन (ionisation) या वैद्युत वियोजन कहलाती है।

उदाहरण – NaCl को पानी मे घोलने पर यह Na+ और Cl- मे बट जाता है।

NaCl ⇌ Na+ + Cl-

2. किसी आवेसित परमाणु या परमाणुओ का समूह आयन कहलाता है। ऐसे आयन जो धनावेशित होते है धनायन Cation कहते है। ऋणावेशित परमाणु या परमाणुओ का समूह ऋणायन Anion कहलाता है।

3. किसी वैद्युत अपघट्य के विलयन मे धनायनो और ऋणायनो की कुल संख्या बराबर होती है। अतः वैद्युत अपघट्य का विलयन विद्युत उदासीन होता है।

4. आयनन एक उत्क्रमणीय अभिक्रिया होती है। जब किसी वैद्युत अपघट्य को जल मे घोलते है, तो वैद्युत अपघट्य के अणुओ तथा आयनो के मध्य साम्यावस्था स्थापित हो जाती है। वैद्युत अपघट्य AB जल मे घोलने पर अणु AB तथा आयनो A+ और B- के मध्य साम्यावस्था होती है।

AB ⇌ A+ + B-
साम्यावस्था पर,

[A+][B-] / [AB] = K

जहा [A+],[B-] तथा [AB] साम्यावस्था पर इनकी सान्द्रताए है तथा एक स्थिराक है। K को वियोजन स्थिरांक या आयनन स्थिरांक Ionisation Constant कहा जाता है।

5. किसी विद्युत अपघट्य को जल में घोलते हैं तो उसके सभी अणु नहीं होते। किसी विद्युत अपघट्य अणुओं का वह वह भाग जो आयनो के रूप में विभाजित होता है। उसे आयनन की मात्रा Degree of Ionisation या वियोजन की मात्रा कहते हैं।

अतः , आयनन की मात्रा

= विभाजित अणुओं की संख्या / अणुओं की कुल संख्या

और ,

आयनन की प्रतिशतता = आयनन की मात्रा × 100 %

6. हर अपघट्य का भौतिक और रासायनिक गुण उसके आयनो के स्वभाव और उनकी मात्रा पर निर्भर करता है।

7. किन्ही अपघट्य के घोल की विद्युत चालकता उसके विलयन में उपस्थित आयनो की संख्या और आवेश पर निर्भर करती हैं।

* वैद्युत-वियोजन का सिद्धांत *

आयनन की मात्रा प्रभावित करने वाले कारक –

किसी भी वैद्युत अपघट्य के आयनन की मात्रा निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है –

1. वैद्युत अपघट्य की प्रकृति

2 विलायक की प्रकृति

3. विलयन का सान्द्रण

4. ताप – ताप मे वृद्धि से आयनन बढ जाता है।

5. विलयन मे समान आयन उपस्थित हो तो आयनन की मात्रा कम हो जाती है।

* वैद्युत-वियोजन का सिद्धांत *

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हार्मोन की परिभाषा और उनके कार्य

समास की परिभाषा और उदाहरण

उपनिषद की परिभाषा और उनकी संख्या

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रासायनिक अभिक्रिया की परिभाषा || रासायनिक अभिक्रिया के प्रकार || योगात्मक अभिक्रिया की परिभाषा || प्रतिस्थापन अभिक्रिया || उत्क्रमणीय अभिक्रिया || उत्क्रमणीय अभिक्रिया की परिभाषा || अपघटन अभिक्रिया की परिभाषा || वियोजन अभिक्रिया की परिभाषा || ऊष्माशोषी और ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया || उपचयन और अपचयन अभिक्रिया || Chemical Reaction in hindi pdf || Redox Reaction pdf ||

रासायनिक अभिक्रिया की परिभाषा –

रासायनिक अभिक्रिया की परिभाषा – इस अभिक्रिया में एक या अधिक पदार्थ आपस मे अभिक्रिया करके एक या अधिक दूसरे अलग गुण पदार्थो का निर्माण करते है। किसी अभिक्रिया मे भाग लेने वाले पदार्थो को अभिकारक कहते है।

रासायनिक अभिक्रिया के प्रकार –

अनेक प्रकार की रासायनिक अभिक्रियाओ का हम अध्ययन करते हैं।

1. योगात्मक अभिक्रिया की परिभाषा और उदाहरण –

ऐसी अभिक्रिया जिसमे दो या दो से अधिक पदार्थ संयोग करके सिर्फ एक पदार्थ बनाते है। इनको योगात्मक अभिक्रिया कहा जाता है।
योगात्मक अभिक्रिया के उदाहरण –
(i) सल्फर को वायु मे जलाने पर सल्फर डाई आक्साइड बनती है।
   S + O2    ———->  SO2
(ii) कली चूना पानी से क्रिया करके बुझा चूना बन जाता है।
  CaO + H2O ———-> Ca(OH)2

2. प्रतिस्थापन अभिक्रिया की परिभाषा –

ऐसी अभिक्रिया जिसमे किसी यौगिक के अणु से कोई एक या अधिक परमाणु के स्थान पर कोई दूसरा परमाणु या परमाणुओं का समूह जुड़ जाता है। उनको प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहा जाता है।
प्रतिस्थापन अभिक्रिया के उदाहरण –
कॉपर सल्फेट के घोल में लोहे की कील डालते हैं तो कील पर कॉपर जमा हो जाता है।
CuSO4 + Fe    ——–>  FeSO4 + Cu

3. अनुत्क्रमणीय अभिक्रिया की परिभाषा – ( Irreversible Reactions )

ऐसी अभिक्रिया है जो सिर्फ एक ही दिशा में संपन्न या घटित हो सकते हैं। इनको अनुत्क्रमणीय अभिक्रिया कहा जाता है।

अनुत्क्रमणीय अभिक्रिया के उदाहरण
(i). पोटेशियम क्लोरेट को गर्म करने पर पोटैशियम क्लोराइड और ऑक्सीजन बनता है।
2(KClO3) ——–> 2KCl + 3O2
अनुत्क्रमणीय अभिक्रिया के कुछ अन्य उदाहरण-
(ii). NaCl + AgNO3 ——> AgCl + NaNO3

(iii). 2Na + 2H2O ———> 2NaOH + H2

4. उत्क्रमणीय अभिक्रिया की परिभाषा –

कुछ अभिक्रियाये जो समान परिस्थितियों में दोनों  दिशाओं में चलती है या घटित हो सकते हैं। वह उत्क्रमणीय अभिक्रिया कहलाती है। जो क्रिया बाएं से दाएं की ओर होती है, वह अग्र अभिक्रिया है। जो अभिक्रिया दाएं से बाएं की ओर होती है, विपरीत अभिक्रिया कहलाती है।
उत्क्रमणीय अभिक्रिया के उदाहरण –
रक्त लोहे भाप से क्रिया करके चुंबकीय ऑक्साइड तथा हाइड्रोजन गैस बनाता है।
3Fe + 4H2O  ⇌ Fe3O4 + 4H2
* रासायनिक अभिक्रिया की परिभाषा *

5. अपघटन अभिक्रिया की परिभाषा – (Decomposition Reaction)

ऐसी अनुत्क्रमणीय अभिक्रिया अभिकारक पदार्थ के अणु दो या दो से अधिक सरल अणुओ मे विभाजित हो जाते है। वह अपघटन decomposition कहलाती है। यह क्रिया ऊष्मा और विघुत के प्रभाव मे घटित होती है। ऊष्मा के प्रभाव मे होने वाला अपघटन ऊष्मीय अपघटन तथा विघुत के प्रभाव से वैघुत अपघटन (electrolysis) कहते है।

अपघटन अभिक्रिया के उदाहरण –
(i)  2KClO3 + ऊष्मा ——> 2KCl +3O2
(ii) 2FeSO4 + ऊष्मा —> Fe2O3 + SO2 + SO3

6. वियोजन अभिक्रिया की परिभाषा – (Dissociation Reaction)

ऐसी उत्क्रमणीय अभिक्रिया जिसमें अभिकारक अणु दो या अधिक सरल अणुओ में विभाजित होते हैं, वियोजन अभिक्रिया कहलाती है। यदि यह क्रिया ऊष्मा के प्रभाव मे होती है तो ऊष्मीय वियोजन कहते है।
उष्मीय वियोजन के उदाहरण –
PCl5     PCl3 + Cl2
NH4Cl         NH3 + HCl

 

उभय – अपघटन अभिक्रिया -( Double Decomposition Reaction )

ऐसी अभिक्रिया है जिनमें यौगिकों के आयनों या घटकों की अदला बदली हो जाती है उसे उभय अपघटन अभिक्रिया कहते हैं। Example –
AgNO3 + NaCl ——> AgCl + NaNO3
CH3COOH+NaOH —> CH3COONa + HOH

8. ऊष्माशोषी अभिक्रिया की परिभाषा – (Endothermic Reactions)

ऐसी रासायनिक अभिक्रिया है, जिसमें ऊष्मा अवशोषित होती है उन्हें उष्माशोषी अभिक्रिया कहा जाता है।
ऊष्माशोषी अभिक्रिया के उदाहरण
N2(g) + O2(g) + 42 KCal —-> 2NO (g)
PCl5 + ऊष्मा ——-> PCl3 + Cl2

 

9. ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया की परिभाषा – (Exothermic Reactions)

ऐसी अभिक्रिया है जिसमें ऊष्मा उत्पन्न होती है,
ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया कहलाती है।
ऊष्माछेपी अभिक्रिया का उदाहरण
(i).  2H2 (g) + O2(g) —–>  2H2O (l)+136.8 KCal
(ii). ग्रेफाइट को वायु में जलाने पर निम्न अभिक्रिया होती है –
C (ग्रेफाइट) + O2 (g) ——-> CO2 (g) + 94.0 KCal

 

10. उपचयन अभिक्रिया और अपचयन अभिक्रिया की परिभाषा – (Oxidation and Reduction Reactions)

यदि अभिक्रिया मे किसी पदार्थ मे आक्सीजन की संयोग अर्थात वृद्धि होती है, उपचयन अभिक्रिया कहलाती है। यदि किसी पदार्थ से आक्सीजन का ह्रास या कमी होती है, तो उसे अपचयन अभिक्रिया कहते है।

उपचयन अभिक्रिया का उदाहरण –
कापर चूर्ण को गर्म करते है तो उसकी सतह काली पड जाती है।
2Cu + O2 ——> 2CuO    ( Cu मे O वृद्धि )

अपचयन का उदाहरण
यदि गर्म कापर आक्साइड के उपर H2 प्रवाहित करे तो भूरे रंग की हो जाती है।
2CuO + H2 ——-> Cu + H2O    ( CuO मे Oका ह्रास )

11. उपचयन – अपचयन अभिक्रिया की परिभाषा –

ऊपर दूसरे उदाहरण में कॉपर ऑक्साइड का चयन हुआ परंतु हाइड्रोजन में O की विधि से H2O बना। इसका मतलब हाइड्रोजन का उपचयन हुआ है। इस प्रकार की घटनाओं को उपचयन अपचयन अथवा रेडॉक्स अभिक्रिया कहते हैं।
ZnO + C ——> Zn +CO
यहां ZnO का अपचयन हुआ है और C का उपचयन हुआ है।
* रासायनिक अभिक्रिया की परिभाषा *

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विटामिन के प्रकार और उनके स्रोत
हार्मोन के प्रकार और उनके कार्य
संख्याओं के वर्गों एवं वर्गमूल पर आधारित प्रश्न
पक्षियों और जानवरों पर आधारित प्रश्न

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वर्ग और वर्गमूल पर आधारित प्रस्न || वर्ग पर आधारित साधारण प्रश्न ||वर्गमूल पर आधारित धनात्मक प्रश्न|| वर्ग और वर्गमूल पीडीएफ || वर्ग संख्या की परिभाषा || वर्गमूल किसे कहते हैं || वर्ग और वर्गमूल pdf || वर्ग और वर्गमूल में अंतर ||

वर्ग और वर्गमूल पर आधारित प्रस्न –

वर्ग और वर्गमूल पर आधारित प्रस्न – विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में संख्याओं के वर्ग और वर्गमूल से विविध प्रकार के प्रश्न आते हैं। सबसे पहले हम वर्ग और वर्गमूल के बारे में पढ़ेंगे। इसके बाद इनसे संबंधित महत्वपूर्ण सवालों का अध्ययन करेंगे।

वर्ग / वर्गमूल की परिभाषा –

किसी संख्या को उसी संख्या से गुणा करने पर प्राप्त होने वाला गुणनफल वर्ग संख्या कहलाता है। इस प्रकार उस संख्या को प्राप्त गुणनफल ( वर्ग संख्या ) का वर्गमूल कहा जाता हैं।

उदाहरण –

7 का वर्ग (7)^2= 49

49 का वर्गमूल 49 = 7

वर्गमूल निकालने की विधियां –

1 गुणनखंड विधि

2 भाग विधि

दशमलव संख्याओं का वर्गमूल ज्ञात करने का सूत्र –

दशमलव संख्या का वर्गमूल निकालने के लिए – दशमलव के दाहिने और बाएं दोनों तरफ दो दो अंकों का समूह बनाएंगे। पूर्णांकों का संबंध इकाई के बाई से बनाते हैं। जबकि अपूर्णाको का समूह दशमलव के दाहिनी ओर से बनाते हैं।
21757.6452 के लिए ,

2 17 57 . 64 52 समूह बनेगा।

भिन्न संख्याओं का वर्गमूल ज्ञात करना –

यदि किसी भिन्न के अंश और हर दोनों ही वर्ग संख्या तो उसका वर्गमूल,

= अंश का वर्गमूल / हर का वर्गमूल

उदाहरण ,

16/25 का वर्गमूल = 16 / 25

= 4/5

वर्ग और वर्गमूल पर आधारित प्रस्न –

Qu. 1. यदि का 841 वर्गमूल 29 हो तो,
8.41 + 0.0841 + 0.000841 = ?

= 2.9 + 0.29 + 0.029

= 3.219

Ans: 3.219

Qu.2. 256 ÷ x = 1/3 तो, x = ?
256 ÷ x = 1/3

》 256 ÷ x = 1/9

》 x = 256 × 9

》 x = 2304

Ans: 2304

वर्ग और वर्गमूल में जोड़ – घटाव पर आधारित प्रश्न-

Qu.3. 8560 मे कौन सी छोटी से छोटी संख्या घटा दें कि प्राप्त नई संख्या पूर्ण वर्ग बन जाए.

8560 का वर्गमूल = 8560

= 92 .52

अतः 8560 से छोटी वर्ग संख्या = (92)^2

= 8464

अतः घटाई जाने वाली संख्या,

= 8560 – 8464

= 96

Ans = 96

वर्गमूल पर आधारित इबारती प्रश्न –

Qu: 4. 484 नींबू को ठोस वर्क के रूप में रखने पर, किसी एक ओर से कितने नींबू दिखाई पड़ेंगे।

एक और से दिखाई पड़ने वाली नींबू

= 324

= (2×2×11×11)

= 2×11

=22

Ans: 22

वर्गों के योग और अंतर पर आधारित प्रश्न –

Qu. 5 . दो संख्याओं के वर्गों का योग 580 है तथा दोनों संख्याओं का योग 34 है। तो उन संख्याओं का गुणनफल ज्ञात कीजिए।

Solution.

A^2 + B^2 = 580

A+B = 34

》(A+B)^2 = A^2 +B^2+ 2A.B

》(34)^2 = 580 + 2 A.B

》1156 = 580 + 2 A.B

》2 A.B = 576

》 A.B = 288

Ans: 288

** वर्ग और वर्गमूल पर आधारित प्रस्न **

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क्रमागत संख्याओं का योग ज्ञात करने का सूत्र

संख्याओं के वर्गों और घनो का योग

उपनिषद की परिभाषा और उनके नाम

ऊर्जा का मुख्य स्रोत

अलंकार की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण

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हार्मोन की परिभाषा || हार्मोन की कमी से क्या होता है || हार्मोन क्या होता है || पुरुषों का लैंगिक हार्मोन कौन सा है || हार्मोन असंतुलन के नुकसान || हार्मोन की कमी कैसे दूर करें|| हार्मोन कितने प्रकार का होता है|| पुरुष हार्मोन ||महिला हार्मोन|| हार्मोन असंतुलन के क्या लक्षण होते हैं|| हारमोंस के प्रकार और उनके कार्य की सूची||

हार्मोन की परिभाषा –

हार्मोन की परिभाषा – बहु कोशिका जंतुओं में जैसे-जैसे जटिलता बढ़ती है, उनके विभिन्न अंगों में समन्वय और नियंत्रण के लिए उनकी अंतः स्रावी ग्रंथियों द्वारा एक विशिष्ट रासायनिक पदार्थ उत्पन्न किए जाते हैं। जिन्हें हार्मोन कहा जाता है। यह रक्त के माध्यम से लक्ष्य कोशिकाओं में पहुंचते हैं। उन लक्ष्य कोशिकाओं की क्रियाओं का नियंत्रण और नियमन करते हैं।

** बहुकोशिकीय अर्थात जटिल जीवो में तंत्रिका तंत्र के अलावा कुछ हार्मोन द्वारा शरीर की क्रियाये नियंत्रित होती है। हार्मोन एक जटिल कार्बनिक यौगिक होता है। **

हार्मोन के कार्य –

हार्मोन हमारे शरीर में उपापचय शारीरिक वृद्धि जनन रक्तदाब खून में जल और लवण की मात्रा आदि अनेको क्रियाओ का नियंत्रण करते है। कुछ हार्मोन प्रेरक की तरह तथा कुछ निरोधक की तरह कार्य करते है।

ग्रंथियों के प्रकार – ( Different types of Glands )

हार्मोन का स्राव के लिए मानव शरीर मे तीन प्रकार की ग्रंथिया होती है –

क). बहि स्रावी ग्रन्थिया – ( Exocrine Glands )

इन ग्रन्थियो से स्रावित तरल नलिकाओ के द्वारा सम्बन्धित अंग मे पहुच जाता है। इसके मुख्य उदाहरण –  लार ग्रन्थि, दुग्ध ग्रन्धि, स्वेद ग्रन्धि, तेल ग्रन्थि आदि है। 

ख). अंतः स्रावी ग्रंथिया –

ये अंतःस्रावी ग्रन्थिया नलिकाविहीन होती है। इन ग्रन्थियो के द्वारा स्रावित रस ‘हार्मोन’ रक्त द्वारा कोशिकाओ तक वितरित होता है। उदाहरण – थायराइड ग्रंन्थि, अधिवृक्क , पीयूष ग्रंथि आदि।

ग). मिश्रित ग्रंथिया –

इन ग्रंथियों का एक भाग अंतः स्रावी और दूसरा भाग बहि स्रावी होता है। इसका मुख्य उदाहरण – अग्नाशय ।

अंतः स्रावी और बहि स्रावी ग्रंथियों में अंतर – ( Difference between Exocrine and Endoceine Glands )

1. बहि स्रावी ग्रंथियों में नलिका पाई जाती है, जबकि अंतः स्रावी ग्रंथियों मे नलिका नही होती है।
2. बहि स्रावी ग्रंथियों के स्राव कई प्रकार के होते हैं। जैसे पाचक रस, तैलीय पदार्थ, म्यूकस इत्यादि। जबकि अंतः स्रावी ग्रंथियों से हार्मोन से मिलता है।
3. अंतः स्रावी ग्रंथियों से स्रावित पदार्थ रक्त द्वारा पूरे शरीर में वितरित होता है।

मनुष्य के शरीर में पाई जाने वाली प्रमुख अंतः स्रावी ग्रंथियां कौन-कौन सी हैं –

1. पीयूष या पिट्यूटरी ग्रन्थि ( 13 हार्मोन )
2 थायराइड ग्रन्थि
3.पैराथायराइड ग्रन्थि
4. अधिवृक्क ग्रन्थि
5. पीनियल काय
6. जनन ग्रन्थि
i ). अंडाशय ( मादा )
ii). वृषण ( नर )
7. अग्नाशय ग्रन्थि ( लैगरहैन्स के समूह ग्लूकोज उपापचय नियन्यण )
8. आहारनाल की श्लेष्मिक कला

** हार्मोन की परिभाषा **


हार्मोन की परिभाषा से विभिन्न परीक्षा में आने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न –
Qu.1.. मास्टर ग्रंथि किसे कहा जाता है –
A. पीयूष ग्रंथि        B. पीनियल काय
C. थायराइड ग्रंथि   D. अंडाशय
Ans. पीयूष ग्रंथि

Qu.2.. एस्ट्रोजन हार्मोन किस ग्रंथि से निकलता है –
A. अंडाशय     B. अधिवृक्क
C. पीयूष ग्रन्थि D.  वृषण
Ans. अंडाशय

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